आखिर! धर्मांतरण क्यों?

[धर्मांतरण, राष्ट्रांतरण का पर्याय –

ऐ! मेरे भारतवर्ष जब-जब नकारात्मक शक्तियों द्वारा तुझे कलंकित करने का प्रयास किया जाता है, सच कहूँ काली, शिव बनकर नकारात्मकता रूपी जहर पी जाने का दिल करता है, पर मैं सचमुच काली या शिव तो हूँ नहीं पर हाँ कलम द्वारा अक्षांश रेखा खींच कर डॉट-डॉट, फुल स्टॉप लगाकार बाहर कर दूँ ‘उन’ हर नकारात्मक भाव कोषों को जो मेरे देश की आत्मा के अमृतरूपी प्रेम रस को अवशोषित करते हैं।

प्राचीनकाल में हमारा अखंड भारतवर्ष हिन्दूकुश पर्वत माला से अरुणाचल और अरुणाचल से बर्मा, इंडोनेशिया तक फैला था। दूसरी ओर यह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और हिन्दूकुश से नीचे सिंधु के अरब सागर में मिलने तक फैला था। जिसे हम भारतवर्ष कहते हैं। बात धर्म की करें तो भारत में हिंदू वैदिक सनातन धर्म को देवी-देवताओं की दिव्य लोक कल्याणकारी विचारधारा से ओतप्रोत मानते हैं। प्राचीन हिंदू विचारकों के अनुसार दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद है, तो सनातन धर्म ही सबसे प्राचीन हुआ। पर समय के साथ महान युग पुरूषों का जन्म हुआ और उनकी विचारधारा को स्वेच्छा या जबरन तरह से अनुयायियों द्वारा भीड़ बढ़ाने का क्रम प्रारम्भ हो गया। कुछ लोगों के लिए यही पापी पेट का सवाल था। बात धर्म की करें तो पूरे विश्व में लगभग 300 धर्म है। जिनमे से 10 धर्म ही लोकप्रिय हैं जिनमें भारत में 7 देखने को मिलते है। इनमें भी भारत में 7 लाख से भी ज्यादा ऐसे लोग हैं जो किसी भी धर्म को नहीं मानते यानि  पूरी तरह नास्तिक। धर्मांतरण का मतलब है नयी विचारधारा में आस्था जगाना। धर्मांतरण कुछ लोगों के लिए मजबूरी है, पर कुछ लोग इसे जबर्दस्ती किसी पर लाद दें तो यह नर्क बन जाता है संवैधानिक हिसाब से अपराध की श्रेणी में आ जाता है।

आप कहेगें कि आखिर! धर्मांतरण होता क्यों हैं? तो इसका ज़वाब है, असमानता उपेक्षा, गरीबी, अन्याय, अशिक्षा, बेरोजगारी इसकी मूल वजहों में से एक हैं। आज भी देश में ऐसे मंदिर हैं जहां कुछ जातियों का प्रवेश वर्जित है। जिसका प्रभाव सन्1981 में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के मीनाक्षीपुरम गाँव के लगभग 150 दलित परिवारों ने इस क्षेत्र के दबदबा वाले थेवर समुदाय के तानों और व्यंग्य से तंग आ कर इस्लाम कबूल कर लिया था। इस घटना के बाद अटल बिहारी वाजपेयी  ने तमिलनाडु जाकर इन परिवारों से दोबारा हिंदू धर्म अंगीकार करने का अनुरोध किया था। दूसरा आपने स्वंय देखा होगा कि आज 21वीं सदी के मार्डन युग में हमने जींस तो पहन लिया पर मानसिकता बहुत जीर्ण है, जब आज भी झाड़ू वाली स्वच्छता कर्मियों को कोई भी हाथ में पैसे नहीं देता। दूर से उछाल कर या जमीन में रखकर दिये जाते हैं। भले वह नहा-धोकर त्योहारी मांगने के लिए खड़ी हों। आज भी कुछ गांवों में जाति विशेष को कुएं पर साथ पानी भरने नहीं दिया जाता। परम्पराओं का नाम देकर जाति विशेष से सदियों तक मानव मल अपने सिरों पर रखकर ढोया है। क्या भगवान ने उन्हें सीवर में उतरने और मैला ढोने के लिए जन्म दिया। क्या यह इंसान नहीं? कितना कुछ बुरा इंसानों ने इंसानों के साथ किया। हिंदू धर्म की माला तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक वंचित समाज के अपने ही परिवार रूपी मोतियों को अपनी माला में दिल से न पिरो लें।

बात कैथोलिक धर्म की करें तो सन् 1542 में सेंट फ्रांसिस जेवियर के आगमन पर भारत में रोमन कैथोलिक धर्म की स्‍थापना हुई। आरोप है कि अंग्रेजों के जाने के बाद मदर टेरेसा से सहानुभूति पाये अति पिछड़ों ने ईसाई धर्म अपना लिया था बाद में कुछ लोगों ने धर्मांतरण को ही धंधा बना लिया ।अमेरिकन वेद’ के लेखक फ़िलिप गोल्डबर्ग अनुसार भारत में गरीब, अशिक्षित और असहाय हिन्दुओं को नौकरी, औषधि और धन का लाचल देकर जिस तरह से ईसाई बनाया जाता है वह निंद‍नीय है। कितना दुखद है कि विडंबना भी आत्महत्या कर ले कि इनके  विद्यालयों में  सुभाष चंद्र बोस जी तक की फोटो नहीं होती। जिस देश में रहते हैं उसके ही  राष्ट्रनायकों की फोटो लगाने में इनकी धार्मिक कट्टरता को देखा समझा जा सकता है। मैं तो साफ कहती हूँ  कि किसी भी तरह कट्टरता जो हमें राष्ट्रभक्ति से दूर करे, उस कट्टरता को देशद्रोही मानसिकता का नाम देना चाहिए।

बता दें कि  मदर टेरेसा  3 अन्य सिस्टरों के साथ आयरलैंड से एक जहाज में बैठकर 6 जनवरी 1929 को कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पंहुचीं थीं। सन् 1949 में मदर टेरेसा ने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की जिसे 7 अक्टूबर 1950 को रोमन कैथोलिक चर्च ने मान्यता दी। आज से 2,985 वर्ष पूर्व अर्थात 973 ईसा पूर्व में यहूदियों ने केरल के मालाबार तट पर प्रवेश किया। यहूदियों के पैगंबर थे मूसा, लेकिन उस दौर में उनका प्रमुख राजा था सोलोमन, जिसे सुलेमान भी कहते हैं।

अब बात इस्लाम धर्म की है तो  अरब व्‍यापारियों के माध्‍यम से इस्‍लाम धर्म 7वीं शताब्‍दी में दक्षिण भारत में और सिंधु नदी के बंदरगाह पर उतरा। इसके पहले इस्लाम ने अफगानिस्तान (पहले जो भारत का हिस्सा था) के उत्तर में हिन्दू शाही वंश पर हमला किया और भारतीय ‍दीवार को तोड़ दिया था। 7वीं सदी में इस्लाम के केरल, बंगाल दो प्रमुख केंद्र थे, जबकि पश्चिम भारत में अफगानिस्तान। इसके बाद 7वीं सदी में ही मोहम्मद बिन कासिम ने बड़े पैमाने पर कत्लेआम कर भारत के बहुत बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया, जहाँ से हिन्दू जनता को पलायन करना पड़ा और जो हिन्दू पलायन नहीं कर सके वे मुसलमान बन गए या मारे गए। आप अयोध्या के मंदिरों में लगे दानदाताओं के नामी पत्थर जिनपर उनका  ‘राम बख्श’ ‘नाम’  के नाम हैं आधे हिन्दू और आधे मुस्लिम यही सबूत हैं कि हमारे पूर्वजों ने कितना दर्द सहा है। आज जिस भू-भाग पर कब्जा किया था, वह आज का आधा पाकिस्तान है, जो पहले कुरु-पांचाल जनपद के अंतर्गत आता था। इस दौर में ईरान में सूफीवाद का प्रारंभ हुआ और भारत में सूफियों के माध्यम से इस्लाम के अच्छे विचारों का प्रचार-प्रसार बढ़ा और 12वीं सदी में पूर्ण रूपेण इस्लाम भारत में प्रविष्ट हुआ। बता दें कि मुगल, तुर्क थे। बात धर्मांतरण और हिंसा की करें तो सबसे ज्यादा हिंसा औरंगजेब के समय हुई।  हिन्द की चादर’ गुरु तेगबहादुर सिंह जी ने जब इस्लाम धर्म स्वीकार करने का विरोध किया, तब उन्हें दिल्ली में कैद कर दिसम्बर, 1765  में उनकी निर्ममता से हत्या कर दी गयी।1539 आसपास एक नए समाज की रचना हुई जिसे बोहरा मुस्लिम समाज कहा जाने लगा। इसके दो विभाजन हैं दाऊदी बोहरा और सुलेमानी बोहरा। दुनिया में तीन ऐसे बड़े धर्म हैं जिनके कारण दुनिया में ‘धर्मांतरण’ जैसा शब्द अस्तित्व में आया। ये बड़े धर्म हैं- बौद्ध, ईसाई और इस्लाम। तीनों ही धर्मों ने दुनिया के पुराने धर्मों के वंचित, शोषित लोगों को अपने धर्म में स्वेच्छा से शिक्षित किया और अस्वेच्छा से धर्मांतरित किया।

प्राचीनकाल से लेकर आज तक भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण होते आए हैं। संविधान कमेटी के अध्यक्ष भीमराव अम्बेडकर जो कि पूरी तरह शिक्षित थे, विदेश से वेरिस्टर की पढ़ाई करके आये थे परन्तु फिर भी वह असमानता को महसूस करते थे और अंततः उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। संविधान में स्वेच्छा से धर्मांतरण का कानून भी है जिसका आज के समय में दुरूपयोग जारी है। दुनिया में सबसे ज्यादा अनुयायी ईसाई धर्म के हैं, दूसरे नम्बर पर इस्लाम है और तीसरे नम्बर पर हिंदू सनातन धर्म है। कारण यह भी है कि दुनिया में 57 मुस्लिम देश हैं। आबादी के हिसाब से भी संख्या में इजाफ़ा होना लाज़िमी है । आज भारत में भी मुस्लिमों की जनसंख्या के कारण ही सभी राजनैतिक दलों को वोट बैंक साधने के लिये इन को रिझाना तक पड़ता है। कभी-कभी फालतू बयानबाजी से हिंदू-मुस्लिम दंगा भड़काने तक की साजिशें रची जाती रहीं हैं। देश के अराजक तत्वों को यह पता होना चाहिये कि भारत की पूरी जनता ने मिलकर माननीय नरेंद्र मोदी जी को दो बार प्रधानमंत्री बनाया है। तथा उत्तर प्रदेश जहाँ सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी है वहां भी योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री चुने जाते हैं क्योंकि कई मुस्लिम भी शांति, रोटी, रोजगार तथा विकास की तरफदारी करते हैं। नफ़रत फैलाने वाले मुठ्ठी भर लोग हैं, जो सबके जीवन और जीविका पर ग्रहण लगाना चाहते हैं और सिर्फ़ अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए। देश में पूरे वर्ष चुनाव ही चलते रहते हैं और टीवी पर फालतू डिबेट। कभी रोटी- रोजगार की डिबेट नहीं चलाते। कभी सकारात्मक न्यूज नहीं दिखाते जिससे देश का माहौल प्रेम और मित्रतापूर्ण रहे। डिबेट में पाकिस्तानियों को बुलाने(चमकाने) से क्या लाभ?

यह जब तक जनता इंसान न होकर मात्र वोटर रहेगा तब तक वोट की चोट मिलती रहेगी। कई बार इसी वोट के कारण धर्मांतरण होते हैं। उत्तर प्रदेश में जबरन रोहिंग्याओं को बसाया जा रहा था बाद में वही हिन्दू या मुस्लिम आदि बन कर वोट डालते। जब तक देश दुनिया में असमानता रहेगी, ऊँच-नीच,भेदभाव रहेगा। तब तक धर्मांतरण को कभी रोका नहीं जा सकता। जनता की सोच जानें तो प्रमोद दास धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए एक केंद्रीय क़ानून पारित किए जाने की पैरवी करते हैं। वह कहते हैं  “मिशनरियों द्वारा बरगलाकर धर्मांतरण करने पर रोक लगाने में यह क़ानून पूरी तरह से विफल रहा है। अगर इस तरह के धर्मांतरण को रोकना है तो एक केंद्रीय क़ानून पारित करने की ज़रूरत है। संविधान की धारा 25 अगर इसमें बाधक होती है, तो उसे संशोधित किया जाना चाहिए।” यह मुद्दा तब ज्यादा गर्मा गया जब  कानपुर के रहने वाले मूकबधिर छात्र आदित्य गुप्ता उर्फ अब्दुल कादिर और रिचा से माहिन अली बन गई। बता दें कि रिचा उर्फ माहिन अली घाटमपुर की रहने वाली है। एमबीए करने के बाद रिचा उर्फ माहिन अली नोएडा की एक कंपनी में जॉब करती है। माहिन अली अपनी सैलरी मस्जिद को दान करती थी। उत्तर प्रदेश समेत दिल्‍ली और अन्‍य शहरों में एक हजार से अधिक लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के अवैध धर्मांतरण के आरोप में गिरफ्तार मोहम्मद उमर गौतम और मौलाना जहांगीर को गिरफ्तार कर दस्‍तावेज कब्‍जे में लिए हैं। जांच में सामने आया है कि दोनों पाकिस्तान के अलावा टर्की और अरब के कई इस्लामिक संगठनों के संपर्क में थे।इनका मकसद ग्रामीण इलाके की महिलाओं और युवतियों का धर्म परिवर्तन कराकर पैसा कमाना था। एटीएस की जांच में खुलासा हुआ है कि यह पीएफआई फंडिंग के लिए अपनी धार्मिक और राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया का इस्तेमाल कर रही है । इसके बाद पांचों आरोपियों को रिमांड पर लेकर फिर से छानबीन की गई। एसडीपीआई के कई खातों में 130 करोड़ रुपए का विदेशी ट्रांजेक्शन मिला था। इसमें ज्यादातर फंडिंग आईएसआई ने की थी।एटीएस सूत्रों के मुताबिक, हिंसा के मामले में जेल भेजे गए यह पांचों मौलाना जमानत पर चल रहे हैं। इनकी हर गतिविधियों की निगरानी की जा रही है। जल्द ही पुलिस इनकी जमानत रद्द करवाकर इन्हें जेल भेज सकती है।

वहीं, वाराणसी के चौबेपुर थाना क्षेत्र के अमौली गांव निवासी युवक अमित मौर्य के धर्मांतरण मामले की जांच एटीएस को सौंपी गई है। फिलहाल पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि पिछले दो साल में अमित किन लोगों के संपर्क में रहा है। इसके अलावा इसी मंगलवार को महाराष्ट्र के बीड से इरफान ख्वाजा खान को गिरफ़्तार किया गया। वह मिनिस्ट्री ऑफ चाइल्ड वेलफेयर में इंटरप्रेटेटर (ट्रांसलेशन करने वाला) का काम करता है। इस मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। कि यह वही इरफान है जिसने 2017 और 2020 में दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा किया था। इन दोनों ही कार्यक्रमों में इरफान ने प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को इशारों के जरिए मूक बधिर लोगों को समझाया था।यूपी एटीएस के आईजी ‘जीके गोस्वामी’ का कहना है कि इरफान मिनिस्ट्री ऑफ चाइल्ड वेलफेयर में जिम्मेदार पद पर पोस्टेड था। हो सकता है वह किसी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के साथ शामिल हुआ हो। हमारी इन्वेस्टिगेशन में सामने आया है कि वह धर्मांतरण के मामले में उसकी भूमिका अहम है। इस मामले में अभी और जांच चल रही है। विचारने योग्य बात यह है कि जहां चीन में उईगर मुसलमानों की दुर्गति है जहां कोई धार्मिक पुस्तक रखना बेन है। तथा जापान में इस्लाम को अपनाने पर पाबंदियां हैं। वैटिकन सिटी जिसकी आबादी महज 825 लोगों की है जहाँ एक भी मुस्लिम नहीं है। वहाँ विश्व के 57 मुस्लिम देश क्यों कुछ नहीं कहते। कितना हास्यास्पद है कि वॉलीवुड के अभिनेता आमिर खान, नसीरूद्दीन शाह को भारत में डर लगता है। यह लोग चीन को कुछ नहीं बोल पाते। वहीं जब अमेरिका चिल्ला चिल्ला कर कह रहा है कि कोरोना चीन से फैला तो पूरी दुनिया मिलकर चीन की वीटो क्यों नहीं छीनने की पेशकश करती? क्योंकि हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ और हैं। हर कोई हैवानियत को जन्म देने वाली इस गंदी राजनीति का शिकार होता जा रहा है।

कभी-कभी तो धर्म की राजनीति इतनी डार्क हो जाया करती हैं जिसमें रोजगार विकास जैसे मुद्दे कहीं गुम हो जाते हैं और लोग भी बेबस कि रोटी चुने या धर्म। इसी भावनात्मक पक्ष का फायदा हर चुनावी पार्टी पूरे मन से उठाती है जिसमें अनेकों कार्यकर्ताओं की शहादत हो जाती है। बंगाल में यही हुआ।1946 में मुस्लिम लीग की ‘सीधी कार्रवाई’ के नाम पर बंगाल में सुहरावर्दी के हैवानी दस्तों ने कोलकाता व प्रदेश के पूर्वी हिस्सों को नर्क बना कर रख दिया।  आंकडे यहां तक हैं कि बंगाल में हिंदुओं की जनसंख्या में रिकार्ड कमी दर्ज की जा रही है।

पर एक समय था जब महात्मा गांधी की शिष्या बीबी अमतुस्सलाम शान्ति स्वयंसेवकों के दस्ते की सदस्या थीं। वह सर्वाधिक दंगा प्रभावित इलाके बंगाल के नोआखाली के दसघरिया गांव में पहुंच कर दंगा पीड़ित हिन्दुओं की सेवा में लग गईं। मुस्लिम लीग के जेहादियों ने जिन हिन्दुओं का जबरन धर्मांतरण करवाया बीबी अमतुस्सलाम ने उन सभी परिवारों का परावर्तन(फिर से हिंदू में) करवाया था। देश के सभी हिंदू संगठन इसलिये चिंतित हैं कि वोट की राजनीति के चलते भारत कभी हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं हो सकता। हिंदुओं की सोच, हमारे पास तो सिर्फ़ यही भारत भूमि है उनके पास तो 57 इस्लामिक राष्ट्र परन्तु ऐसा सोचने में पेच है कि भारतीय मुसलमान कितना भी टीवी डिबेट में चिल्लाये पर वह भारत त्यागने की कभी नहीं सोचता। वह भी भारत से बेहद प्यार करता है और भारतीय सेना में शामिल होकर शहादत देने तक से क़भी नहीं डरता। टीवी डिबेट में पाकिस्तानी लेखक  तारेक फतेह जब भारतीय मुसलमानों को बुरा ही बुरा कहते हैं तो मुसलमानों का दर्द यह है कि एक पाकिस्तानी की बातों को इतनी तवज्जो क्यों?  हम सब भारतीय हैं। हम अपने मसले खुद मिलकर प्रेम से निपटायेगें। और सच भी है कि भारत में लेखकों की कमी है क्या? जो हम तारेक फतेह को सुनेगें। नजनीन अंसारी ट्विटर पर स्पष्ट लिखतीं हैं कि बहनों हिंदुओं से ब्याह करो, हलाला से बचो। इन भड़काऊ ट्वीट से होता यह है कि कुछ मुस्लिम लड़के बदले की भावना से अपना गुस्सा किसी हिंदू लड़की को प्रेमजाल में फंसाकर लेते हैं। यह जो कुछ भी सोसल मीडिया पर नफ़रतरूपी खिचड़ी पकती है इसकी कीमत अनेकों मासूम लोगों को अपनी जान से चुकानी पड़ती है। धर्मांतरण की वजह आज का हानिकारक सोसल मीडिया बना हुआ है जहां से हर कोई ‘बन’ कम रहा ‘बिगड़’ ज्यादा रहा। कुछ शादीशुदा उम्रदराज महिलाओं ने कम उम्र के लड़कों को अपनी हवसपूर्ति  के लिए अनेकों धर्मों के कम उम्र के लड़कों को मात्र ‘वस्तु’ की तरह प्रयोग करने वास्ते उन्हें अपने फ्लेट पर बुलाकर अय्याशी करके उनका धर्म परिवर्तन तक करवाने के षड्यंत्र में शामिल हैं और यहां तक कि वे कुछ लड़कों का ऐसा ब्रेन वॉस करतीं हैं कि वह अपना लिंग विच्छेद कर किन्नर तक बन जाया करते हैं। फिर यह लोग अनाथ बच्चों को ढूंढ कर उनका यौन उत्पीड़न करके उनका धर्म-कर्म-लिंग तक को परिवर्तित कर डालने का घिनौना काम करते हैं। कई बार यही लिंग विच्छेदन हुए लोग उस नर्क से भागकर कुम्भ मेले में किसी बाबा के चेले बनकर सनातन संस्कृति की गोद में अपनी मायूस जिंदगी में भक्ति के रंग भरते दिखाई दे जाते हैं।

गौरतलब है कि मौजूदा जबरन धर्मांतरण के संकट को संवैधानिक स्वतन्त्रता के साथ जोड़ कर कतई नहीं देखा जा सकता। इस तरह के धर्मांतरण का पर्याय राष्ट्रांतरण का द्योतक है। इतिहास साक्षी है कि देश के जिस-जिस भाग में धर्मांतरणवादी उन्मादी नकारात्मक शक्तियाँ हावी हुई हैं, देश विखण्डित ही हुआ है और जो टुकडा टूटा वह देखो! पाकिस्तान, आतंकिस्तान बनकर पूरी भारत ही नहीं पूरी दुनिया को परेशान कर रहा है। स्वामी विवेकानन्द जी कहते थे कि ‘एक हिन्दू का धर्मान्तरण केवल एक हिन्दू का कम होना नहीं, बल्कि एक शत्रु का बढ़ना है।’ मेरा सुझाव है कि आज देश की आईडी कार्ड जैसे  पहचान-पत्र, आधार, पैन कार्ड आदि पर पिता के साथ माता का भी नाम दर्ज होना चाहिए।जिसमें साफ लिखा होता है कि यह आपकी पहचान है पर यह नागरिकता प्रमाणपत्र नहीं है। देश की दस्तावेजी लावारिसी सर्वप्रथम दूर हो। जिससे देश से लावारिस,, नाजायज जैसे शब्दों को मिटाया जा सके। सरकार को चाहिये कि प्रतिवर्ष वह देश के सभी धर्मों के धर्म गुरुओं की सभा का आयोजन एक मंच पर करवाने का निर्णय लें जिससे देश में शांति, प्रेम, सद्भावना, सौहार्द, मैत्री, सहजता, उन्नति, रोजगार का मार्ग प्रशस्त हो जिससे अपने व सभी धर्मों के प्रति सम्मान भाव में बढ़ोत्तरी हो। देश में किसी भी तरह की हिंसा पर पूरी तरह रोक हो। एक रिपोर्ट कहती है कि सबसे तनावग्रस्त लोग भारत में हैं। सोचो! युवा पीढ़ी तनावग्रस्त रहेगी तो देश का विकास कैसे सम्भव होगा?आज उन्नति की गीता कैसे पूर्ण हो जब देश का डिग्रीधारी भविष्य अर्जुन  रिक्शा चला रहा है। आखिरकार! हम सभी भारतीय कब तक यूंही लड़ते रहेगें? एक बार एक मंच पर पर साथ बैठकर फैसला कर लो। याद रखो… पेट की भूख लड़ाई से नहीं बुझने वाली। यह धर्मांतरण तब बंद होगा जब कर्मांतरण की बात हमारे हृदय /जेहन में उतर जायेगी।प्रेम ही एक मात्र रास्ता है जिसे सभी धर्मों ने माना है। अब निर्णय आपका है…।

✍️आकांक्षा सक्सेना, न्यूज ऐडीटर सच की दस्तक

सच की दस्तक राष्ट्रीय मासिक पत्रिका पढ़ने के लिए कृपया वेवसाईट विजिट करें और अपने लेख व रचनायें भेजने के लिए हमें मेल करें।
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धन्यवाद 🙏💐

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