Delhi Assembly Election 2020: संघर्ष से सत्‍ता के शीर्ष तक AAP ‘केजरीवाल’

आम आदमी पार्टी लगातार तीसरी बार दिल्‍ली में सरकार बनाने की तरफ आगे बढ़ रही है। रुझानों में पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है। रुझानों के इसी तरह बने रहने पर यदि अरविंद केजरीवाल सरकार बनाने में सफल हुए तो वह शीला दीक्षित के बराबर आकर खड़े हो जाएंगे। शीला दीक्षित ने लगातार तीन बार विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज कर दिल्‍ली में कांग्रेस की सरकार बनाई थी। बहरहाल, लोकपाल को लेकर सड़क पर संघर्ष और अनशन के दौरान बनी आम आदमी पार्टी कभी सत्‍ता के शीर्ष पर पहुंचने का स्‍वाद चखेगी ये किसी ने नहीं सोचा था। आज भी हम लोगों के जहन में अरविंद केजरीवाल की वो पहचान धुंधली नहीं पड़ी है।

संघर्ष का समय-

इस आंदोलन की आवाज को जनमानस तक फैलाने में सोशल मीडिया ने भी अहम भूमिका निभाई थी। इसके समर्थन में हजारों की संख्‍या में लोग सड़क पर उतर गए थे। इन सभी की मांग थी कि केंद्र सरकार देश में फैले भ्रष्‍टाचार को खत्‍म करने के लिए जनलोकपाल विधेयक लेकर आए। मांग में ये भी था कि इसके दायरे मेंं हर कोई आना चाहिए। इतना ही नहीं इनकी तरफ से लोकपाल विधेयक को लेकर एक मसौदा भी सरकार को सौंपा गया था, लेकिन तत्‍कालीन केंद्र सरकार ने इसपर कोई तवज्‍जो नहीं दी थी। 5-9 अप्रैल के बीच अन्‍ना ने अनशन शुरू किया।

इसको देखते हुए सरकार ने कुछ सकारात्‍मक रुख अपनाया जिसके बाद अन्‍ना ने अनशन खत्‍म करने का फैसला लिया, लेकिन सरकार ने बाद में इस आंदोलन को कोई तवज्जो नहीं दी। मई 2011 में इसको लेकर अन्‍ना हजारे ने अनशन शुरू किया। धीरे-धीरे इस आंदोलन से जनमानस जुड़ता चला गया। इस अनशन और आंदोलन को मिलते समर्थन को देखते हुए सरकार ने 16 अगस्‍त 2011 तक लोकपाल विधेयक संसद में लाने की मांग को मान लिया था।

लोकपाल की मांग पर सड़क – संघर्ष 

26 नंवबर 2012 को अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के गठन की घोषणा की थी। यह घोषणा भारतीय संविधान अधिनियम की 63 वीं वर्षगांठ के मौके पर दिल्‍ली के जंतर मंतर से की गयी थी। 2 अक्‍टूबर को इस पार्टी का आधिकारिक गठन किया गया। आम आदमी पार्टी के इतिहास की बात करें तो यह कुछ वर्ष पुराना है। अप्रैल 2011 में इंडिया अगेंस्ट करपशन की मांग को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में जन लोकपाल की आवाज बुलंद की गई थी। इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल के अलावा मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव, किरण बेदी, प्रशांत भूषण समेत कई बड़े चेहरे भी जुड़े थे। 

‘आप’ का पहला चुनाव 

वर्ष 2013 में इस पार्टी ने झाड़ू के निशान पर पहली बार दिल्‍ली विधानसभा चुनाव का लड़ा और 28 सीटों पर जीत दर्ज की। सत्‍ता से भाजपा को दूर रखने के लिए कांग्रेस ने आप को समर्थन दिया और पार्टी ने केजरीवाल के नेतृत्‍व में सरकार बनाई।  28 दिसंबर 2013 को उन्‍होंने दिल्‍ली के 7वें सीएम के तौर पर शपथ ली। हालांकि, उनकी ये सरकार ज्‍यादा दिन नहीं चल सकी। करीब 49 दिनों के बाद 14 फरवरी 2014 को विधान सभा द्वारा जन लोकपाल विधेयक प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को समर्थन न मिलने के कारण अरविंद केजरीवाल की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया था। इसके बाद वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने धमाकेदार जीत दर्ज करते हुए 67 सीटों पर जीत दर्ज की। इस चुनाव में लगातार 15 वर्षों तक दिल्‍ली में हुकूमत करने वाली कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से बाहर हो गई, जबकि भाजपा को महज तीन सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था।

अगस्त से शुरु हुए मानसून सत्र में सरकार ने जो लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया वह आंदोलन की मांग के अनुरूप नहीं था। इसको देखते हुए एक बार फिर से इस आंदोलन ने जोर पकड़ा और अन्‍ना ने फिर अनशन पर बैठने की धमकी दे डाली। लेकिन इससे पहले ही उन्‍हें दिल्‍ली पुलिस ने गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में डाल दिया। अन्‍ना की गैर मौजूदगी में केजरीवाल ने इस आंदोलन का नेतृत्‍व किया और सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की। इसका नतीजा ये हुआ कि सरकार को अन्‍ना को रिहा करना पड़ा था। दिल्‍लीवासियों को वो दिन आज भी याद है जब अन्‍ना को जेल से रिहा किया गया और वो एक विशाल जुलूस की शक्‍ल में वापस आंदोलन वाली जगह पर  पहुंचे थे।  

अन्‍ना

अन्‍ना की मांग

यहां पर पहुंचने के बाद के बाद फिर अनशन शुरू हुआ। इस बीच लगातार सरकार से बातचीत होती रही। दस दिन बाद भी सरकार अन्‍ना का अनशन समाप्‍त करवाने में सफल नहीं हो सकी। इसके बाद अन्‍ना ने अपना अनशन समाप्त करने के लिए सार्वजनिक तौर पर तीन शर्तों का ऐलान किया। उनका कहना था कि सभी सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाया जाए, सभी सरकारी कार्यालयों में एक नागरिक चार्टर लगाया जाए और सभी राज्यों में लोकायुक्त हो। उनका कहना था कि यदि सरकार इन मांगों पर राजी हो जाती है और लोकपाल विधेयक पर संसद में चर्चा करती है तो वह अनशन समाप्‍त कर देंगे। 

सरकार का दांव 

सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बने गतिरोध को खत्‍म करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे पर लोकसभा में ऐलान किया कि संसद अरुणा राय और डॉ जयप्रकाश नारायण सहित अन्य लोगों द्वारा पेश विधेयकों के साथ जन लोकपाल विधेयक पर भी विचार करेगी। उसके बाद विचार-विमर्श का ब्यौरा स्थायी समिति को भेजा जाएगा। आंदोलन जहां समाप्ति के करीब आ रहा था वहीं आंदोलन कर रहे लोगों में यह सोच पनप रही थी कि राजनीति में आए बिना अपनी मांगों को मंगवाना मुश्किल है। हालांकि, अन्‍ना भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन को राजनीति से अलग रखना चाहते थे। अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों की राय थी कि एक राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव में उतरा जाए। इसी सोच के मद्देनजर केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के गठन की घोषणा की।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *