रंगभरी एकादशी पर शमशान में खेली गई होली

सच की दस्तक वाराणसी

काशी में रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद बाबा विश्वनाथ खुद भक्तों के संग महाश्मशान पर होली खेलते है। लोगो का मानना है कि मृत्यु के बाद जो भी मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए आते हैं, बाबा उन्हें मुक्ति देते हैं। यही नहीं, इस दिन बाबा उनके साथ होली भी खेलते हैं। मान्यता यह भी है कि काशी नगरी में प्राण छोड़ने वाला व्यक्ति शिवत्व को प्राप्त होता है। सृष्टि के तीनों गुण सत, रज और तम इसी नगरी में समाहित हैं। फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को बाबा विश्वनाथ के भक्तों संग खेली गयी होली की परंपरा के तहत लोगों द्वारा डमरुओं की गूंज और हर हर महादेव के नारों के बीच एक-दूसरे को भस्म लगाई जाती है। आज यह सब भी हुआ। यहां होली की छटा देखते ही बनती है। इसकी पौराणिक मान्यता भी इसकी है इनके अनुसार महाशमशान ही वो स्थान है, जहां कई वर्षों की तपस्या के बाद महादेव ने भगवान विष्णु को संसार के संचालन का वरदान दिया था। काशी के मणिकर्णिका घाट पर शिव ने मोक्ष प्रदान करने की प्रतिज्ञा ली थी। काशी दुनिया की एक मात्र ऐसी नगरी है जहां मनुष्य की मृत्यु को भी मंगल माना जाता है। मृत्यु को लोग उत्सव की तरह मनाते है। मय्यत को ढोल नगाडो के साथ श्मशान तक पहुंचाते है। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी एकादशी के दिन माता पार्वती का गौना कराने बाद देवगण एवं भक्तों के साथ बाबा होली खेलते हैं। लेकिन भूत-प्रेत, पिशाच आदि जीव-जंतु उनके साथ नहीं खेल पाते हैं। इसीलिए अगले दिन बाबा मणिकर्णिका तीर्थ पर स्नान करने आते हैं और अपने गणों के साथ चिता भस्म से होली खेलते हैं। नेग में काशीवासियों को होली और हुड़दंग की अनुमति दे जाते हैं। कहते है साल में एक बार होलिका दहन होता है, लेकिन महाकाल स्वरूप भगवान भोलेनाथ की रोज होली होती है। काशी के मणिकर्णिका घाट सहित प्रत्येक श्मशान घाट पर होने वाला नरमेध यज्ञ रूप होलिका दहन ही उनका अप्रतिम विलास है।

पर्यटकों के लिए है अचंभित करने वाला दृश्य दिखाई पड़ा।
भावों से ही प्रसन्न हो जाने वाले औघड़दानी की इस लीला का लुत्फ देसी-विदेशी पर्यटकों भरपूर उठाते हैं। अबीर गुलाल से भी चटख चिता भस्म की फाग के बीच वाद्य यंत्रों व ध्वनि विस्तारकों पर गूंजते भजन माहौल में एक अलग ही छटा बिखेरती है। जिससे इस घड़ी मौजूद हर प्राणि भगवान शिव के रंग में रंग जाता है। इस अलौकिक बृहंगम दृष्य को अपनी नजरों में कैद करने के लिए गंगा घाटों पर देश-विदेश के हजारों-लाखों सैलानी जुटते हैं।

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