आज के साहित्य का दौर? ✍️भावना ठाकर

आज के दौर के उभरते युवा साहित्य कारों को जब हम पढ़ते है तब एक खुशी भी होती है की चलो लिखने वालों का दौर खत्म नहीं हुआ पर दूसरी ओर एक दर्द की टिश भी उठती है,
नये लेखकों की बाढ़ आई है नये लेखकों को नवसृजन करके परिवर्तन से समाज की दशा व दिशा बदलनी होगी, आज के साहित्य में ना मौलिकता रही है ना लेखकों में कौशल्य दिखता है लेखन में भी गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते लेखक तड़कते भड़कते और ग्लेमरस रुप पाठकों के आगे परोसे जा रहे है, विचार को शाब्दिक अर्थ प्रदान करने की क्षमता विलुप्त होती जा रही है।
आज साहित्य चिंता का विषय बन गया है आज के युवाओं का मन ओर दिल मानों युद्ध का मैदान बन गया है, एसा महसूस होता है मानों फूल के भीतर से पराग रज झर गई है ओर मर्मस्पर्शी शब्दों ने कृरता की चद्दर ओढ़ ली है।
वो बादलों की कहानी, चाँद तारों की गुफ़्तगु, वो धरती का आसमान को चुम्बन देना, वो पहले इश्क की एक शर्मीले पर्दे से छनकर आती शब्दों की झलकियां, वो वक्त, घड़ी, या ज़िंदगी को कागज़ पर उभारना कहाँ गया सब ?
आज उस तरह के साहित्य की जगह ले ली है फ़स्ट्रेशन ने, आहत ने, दर्द ने, भ्रष्टाचार ने, धर्मं के नाम पर उठ रही बवाल ओर बलात्कारी वहशि दरिंदों पर गुस्से से खूँखार होती कलम मानों आग उगल रही है, आज की उभरती लेखिका के मन से उठते भाव छलनी करते है, उनकी लिखावट में समाज के प्रति, मर्दों के प्रति, ओर अपने ही परिवार के प्रति नफ़रत की आँधी दिखती है, छली हुई औरतों की दास्तान ओर लूटी हुई अस्क्यामत की दर्द सभर कहानीयाँ मिलती है।
आज के युवा लेखकों की बातों से हर मुद्दे पर विद्रोह ओर नाराज़गी के जला देने वाले सनसनीखेज ओर उत्तेजक लेख पढ़ कर मन आहत हो जाता है की कहाँ जा रहा है हमारा समाज क्यूँ इतना आक्रोश ओर उन्माद भरा है शायद आज की पीढ़ी को समाज से ओर परिवार से की हुई उम्मीदें सत्य ओर से तथ्य से परे ही मिली हो।
कुछ एक आसान से तथ्यों का अनुसरण शायद आज के युवाओं को सानुकुल मानसिकता दे पाए की  
जो तुम मांग रहे हो उसे स्वीकारने की क्षमता है, 
जो खा रहे है क्या वो पचा पाओगे,
जो दिख रहा है उसका अर्थ या तात्पर्य समझ में आ
रहा है , जो सुनाई दे रहा है उसमें से सत्य का गौहर छानने की क्षमता है तुम में?
हर वो चीज़ पा सकता है आज का युवा बस हर सत्य को सहने का आदि बना ले खुद को या उसे बदलने की ठान लें समाज का सत्य यही है जो तुम अपनी कलम से गुस्सा ओर नफ़रत उडेल रहे हो, उसे बदलने की क्षमता भी तुम में है किसी की सोची समझी चाल के मोहरे बनने की बजाय एकजुट होकर समाज हित में उपयोगी बनकर इस मानसिकता ओर आहत करने वाले दौर को बदल दो अगर नहीं बदल पाते तो जो जैसे चलता है उसे स्वीकारने की तैयारी रखो।
साहित्य युवाओं की धरोहर है आने वाली असंख्य पीढ़ीयां आपको पढ़ेगी तुम क्या देकर जाना चाहते हो ?
शब्दों का शालीन घट जिसे पढ़ कर तुम्हारी आने वाली पीढ़ी आकर्षित हो साहित्य के प्रति या आहत मन से निकले हुए बिखरे हुए टूटे फूटे अल्फ़ाज़ों का मजमा जिसे पढ़ कर वो भी विद्रोह ओर नफ़रत से घिर जाए।
समाज को समझना होगा परिवर्तन ओर प्रगति युवाओं के दिमाग में ज़हर का नहीं प्यार का असर भर दे वो है, ना की युवाओं को मजबूर कर दे हर मुद्दे पर विरोध ओर नफ़रत की स्याही का रंग भर देने पर।
मन के भाव शुद्ध होंगे तभी साहित्यिक भाषा सुंदर होगी तभी युवा लिख पाएगा कायनात के हर रुप को सुनहरे अक्षरों की आहुतियों से साहित्यिक यज्ञ में अपने श्रेष्ठ योगदान देते हुए।।
__भावना ठाकर
बेंगलोर
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