बाबा कीनाराम धाम में उमड़ा जन सैलाब

0

सच की दस्तक डिजिटल न्यूज डेस्क चन्दौली 

जितेंद्र मिश्रा 

घोरो के घोर अघोरेश्वर बाबा कीनाराम की जन्मस्थली व तपस्थली रामगढ़ में 427वें जन्मोत्सव के दूसरे दिन शुक्रवार को भक्तों श्रद्धालुआंे की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। एक तरफ लोग कतार बद्ध होकर बाबा कीनाराम के दर्शन पूजन कर रहे थे तो दुसरी तरफ सांस्कृतिक कार्यक्रम में आये हुए क्षेत्रीय कलाकारों द्वारा पेश की जा रही प्रस्तुति पर जमकर बाहबाही व तालियां बटोरी जा रही थी। प्रातः काल 8बजे से मोहनभोग का प्रसाद वितरण किया जो अपरान्ह लगभग 1बजे तक चला उसके तुरन्त बाद अन्नपूर्णा भवन खोल दिया गया। जहां लोग प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण किया जो पुनः तीन बजे बन्द कर पुनः मोहनभोग वितरण चालू कर दिया जो सायम 9बजे तक चला। पुनः अन्नपूर्ण भवन में जाकर प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण किया। वही चारो तरफ बाबा कीनाराम व हर-हर महादेव के नारे से पूरा पांडाल कीनाराम व हर-हर महोदव के उद्घोष से गुजायंमान हो रहा था। लगभग पांच कीलोमीटर के परिक्षेत्रे में पूरा क्षेत्र बाबा कीनाराम मय बना हुआ है।

 

सांस्कृतिक कार्यक्रम की रही धूम

बाबा कीनाराम जन्मोत्सव के दुसरे दिन शुक्रवार को प्रभात बेला में आरती, सुंबह 9बजे 11बजे तक रामयाण पाठ मुन्ना पाण्डेय, दीपक यादव, मधुसूदन मिश्र, महानन्द तिवारी व सहयोगी संग, 11बजे से 4बजे तक संस्कृतिक कार्यक्रम मंें मॉ खण्डवारी देवी इण्टर कालेज की बच्चियेा द्वारा काय्रक्रम, सुरेश सरगम, सीमा यादव, निवास केसरी, रिकी सिह, कुॅवर मिलन प्रताप सिह , विक्की तिवारी द्वारा जोरदार प्रस्तुति की गयी। 4बजे से 6बजे तक संगोष्ठी विकास सिंह, देवब्रत चौबे, डा0 सुबेदार सिंह, अशोक पाण्डेय, रात्री 8बजे से 10बजे तक आरती, रात्री 10बजे से 3.30बजे तक कव्वाली राकेश यादव, बसीम बारसी व नाज बारसी द्वारा प्रस्तुति कर धूम मचा दिया चारेा तरफ हर-हर महादेव, बाबा कीनाराम के नारे गूंजायमान होते रहे।

 

गोष्ठी में बाबा कीनाराम जीवन चरित्र व उनकी महिमा का किया बखान

बाबा कीनाराम के 426वें जन्मोत्सव के दौरान शुक्रवार को विकास सिंह, देवब्रत चौबे, सुबेदार सिंह, अशोक पाण्डेय ने बाबा कीनाराम के जीवन चरित्र पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि अघोराचार्य बाबा कीनाराम का जन्म सन् १६०१भाद्रपद कृष्ण पक्ष के अघोर चर्तुदशी तिथि को रामगढ़ गाँव में अकबर सिंह के घर हुआ। माता पिता के दबाव में बारह वर्ष की अवस्था में विवाह अवश्य हुआ पर वैराग्य हो जाने के कारण गौना नहीं हो पाया और ये बाल्यावस्था में बान गंगा के तट पर घनघोर जंगल में चले जाते थे ओर एक वट वृक्ष के नीचे बैठकर आसन जमाकर ध्यानमग्न हो जाया करते थे इनकी लीला को देखकर बाल सखा व परिजन सहित ग्रामीणों का धीरे-धीरे इनसे मोह भंग होने लगा और लोग इनकी साधना में अवरोध उत्पन्न करना बन्द कर दिया।

इन्होने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण करते हुए गिरनार पर्वत पर बस गये और वही से बाबा कीनाराम सिद्ध महात्मा बने। इन्होने अपने जीवन की अनेक चमत्कारी घटनाएं की हैं। सन् १७६९को काशी में अघोराचार्य बाबा कीनाराम जी के 175वर्ष की आयु में समाधिस्थ हो गए।

बाबा किनाराम उत्तर भारतीय संत परंपरा के एक प्रसिद्ध संत थे, जिनकी यश-सुरभि परवर्ती काल में संपूर्ण भारत में फैल गई। वाराणसी के बालमिकी कुण्ड बान गंगा के तट पर पर स्थित रामगढ़ में एक कुलीन रघुवंशी क्षत्रिय परिवार में जन्म हुआ। बचपन से ही इनमें आध्यात्मिक संस्कार अत्यंत प्रबल थे। तत्कालीन रीति के अनुसार बारह वर्षों के अल्प आयु में, इनकी घोर अनिच्छा रहते हुए भी, विवाह कर दिया गया किंतु दो तीन वर्षों बाद द्विरागमन की पूर्व संध्या को इन्होंने हठपूर्वक माँ से माँगकर दूध-भात खाया। सनातन धर्म में मृतक संस्कार के बाद दूध-भात एक कर्मकांड है। बाबा के दूध-भात खाने के अगले दिन सबेरे ही वधू के देहांत का समाचार आ गया। सबको आश्चर्य हुआ कि इन्हें पत्नी की मृत्यु का पूर्वाभास कैसे हो गया। अघोरपंथ के ज्वलंत संत के बारे में ऐक कथानक प्रसिद्ध है।

वैराग्य

यह विरक्त तो रहते ही थे, घर से भी निकल पड़े और घूमते-फिरते गाजीपुर (अब बलिया) जिले के कारों ग्राम के पास कामेश्वर धाम में रामानुजी संप्रदाय के संत शिवाराम की सेवा में पहुँचे। कुछ समय बाद दीक्षा देने के पूर्व महात्मा जी ने परीक्षार्थ इनसे स्नान ध्यान के सामान लेकर गंगातट पर चलने को कहा। यह शिवाराम जी की पूजनादि की सामग्री लेकर गंगातट से कुछ दूर पहुँच कर रुक गए तथा गंगाजी को झुककर प्रणाम करने लगे। जब सिर उठाया तब देखा कि भागीरथी का जल बढ़कर इनके चरणों तक पहुँच गया है। इन्होंने इस घटना को गुरु की महिमा मानी। शिवाराम जी दूर से यह सब देख रहे थे। उन्होंने किशोर किनाराम को असामान्य सिद्ध माना तथा मंत्र दीक्षा दी। जनश्रुतियों के अनुसार कामेश्वर धाम में साधना के दौरान बाबा कीनाराम प्रतिदिन मध्यरात्रि में कारांे से पैदल चलकर करीमुद्दीनपुर के कष्टहरणी भवानी मंदिर पहुंचकर दर्शन करते थे और भोर होने से पहले कारो पहुंच जाते थे। बाबा किनाराम को माता कष्टहरणी ने अपने हाथों से प्रसाद देकर सिद्धि प्रदान की थी।

पत्नी की मृत्यु के बाद शिवाराम जी ने जब पुनर्विवाह किया तब कीनाराम जी ने उन्हें छोड़ दिया। घूमते-घामते नईडीह गाँव पहुँचे। वहाँ एक वृद्धा बहुत रो-कलप रही थी। पूछने पर उसने बताया कि उसके एकमात्र पुत्र को बकाया लगान के बदले जमींदार के सिपाही पकड़ ले गए हैं। कीनाराम जी ने वृद्धा के साथ जमींदार के द्वार पर जाकर देखा कि वह लड़का धूप में बैठा है। जमींदार से उसे मुक्त करने का आग्रह व्यर्थ गया तब कीनाराम ने जमींदार से कहा-जहाँ लड़का बैठा है वहाँ की धरती खुदवा ले और जितना तेरा रुपया हो, वहाँ से ले। हाथ दो हाथ गहराई तक खुदवाने पर वहाँ रुपए का ढ़ेर पड़ा देखकर सब स्तंभित रह गए और लड़के तो तुरंत बंधनमुक्त कर ही दिया। जमींदार ने बहुत क्षमा मांगी। बुढ़िया ने उस बालक को कीनाराम जी को ही सौंप दिया। जिनका नाम बीजाराम पड़ा और कीनाराम जी के शरीर त्याग पश्चात वाराणसी के उनके मठ की गद्दी पर वही अधिष्ठित हुए।

गिरनार की यात्रा

औघड़ों के मान्य स्थल गिरनार पर किनाराम जी को दत्तात्रेय के स्वयं दर्शन हुए थे जो रुद्र के बाद औघड़पन के द्वितीय प्रतिष्ठापक माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि परम सिद्ध औघड़ों को भगवान दत्तात्रेय के दर्शन गिरनार पर आज भी होते है वर्तमान काल में, किनारामी औघड़पंथी परमसिद्धों की बारहवीं पीढ़ी में, वाराणसीस्थ अघोरेश्वर भगवान राम को भी गिरनार पर्वत पर ही दत्तात्रेय जी का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ था। गिरनार के बाद कीनाराम जी बीजाराम के साथ जूनागढ़ पहुँचे। वहाँ भिक्षा माँगने के अपराध में उस समय के नवाब के आदमियों ने बीजाराम को जेल में बंदकर दिया। वहाँ रखी 981चक्कियों में से, जिनमें से अधिकतर पहले से ही बंदी साधु संत चला रहे थे, एक चक्की इनको भी चलाने को दे दिया। कीनाराम जी ने सिद्धिबल से यह जान लिया तथा दूसरे दिन स्वयं नगर में जाकर भिक्षा माँगने लगे। आश्चर्य कि सब 981चक्कियाँ अपने आप चलने लगीं। समाचार पाकर नवाब ने बहुत क्षमा माँगी और बाबा के आदेशानुसार यह वचन दिया कि उस दिन से जो भी साधु महात्मा जूनागढ़ आएँगे उन्हें बाबा के नाम पर ढ़ाई पाव आटा रोज दिया जाएगा। नवाब की वंशपरंपरा भी बाबा के आशीर्वाद से ही चली।

अघोरपंथ के साधक

उत्तराखंड हिमालय में बहुत वर्षों तक कठोर तपस्या करने के बाद किनाराम जी वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट के श्मशान पर रहने वाले औघड़ बाबा कालूराम (जो स्वयं भगवान दत्तात्रेय थे) के पास पहुँचे। कालूराम जी बड़े प्रेम से दाह किए हुए शवों की बिखरी पड़ी खोपड़ियों को अपने पास बुला-बुलाकर चने खिलाते थे। किनाराम को यह व्यर्थ का खिलवाड़ लगा और उन्होंने अपनी सिद्धि शक्ति से खोपड़ियों का चलना बंद कर दिया। कालूराम ने ध्यान लगाकर समझ लिया कि यह शक्ति केवल कीनाराम में है। इन्हें देखकर कालूराम ने कहा-भूख लगी है। मछली खिलाआंे किनाराम ने गंगा तट की ओर मुख कर कहा-गंगिया, ला एक मछली दे जा। एक बड़ी मछली स्वतः पानी से बाहर आ गई। थोड़ी देर बाद कालूराम ने गंगा में बहे जा रहे एक शव को किनाराम को दिखाया। किनाराम ने वहीं से मुर्दे को पुकारा, वह बहता हुआ किनारे आ लगा और उठकर खड़ा हो गया। बाबा किनाराम ने उसे घर वापिस भेज दिया पर उसकी माँ ने उसे बाबा की चरणसेवा के लिए ही छोड़ दिया।

इन सब के बाद, कहते हैं, कालूराम जी ने अपने स्वरूप को दर्शन दिया और किनाराम को साथ, क्रींकुण्ड ले गए जहाँ उन्हें बताया कि इस स्थल को ही गिरनार समझो। समस्त तीर्थों का फल यहाँ मिल जाएगा। किनाराम तबसे प्रायः उसी स्थान पर रहने लगे। अपने प्रथम गुरु वैष्णव शिवाराम जी के नाम पर उन्होंने चार मठ स्थापित किए तथा दूसरे गुरु, औघड़ बाबा कालूराम की स्मृति में क्रींकुंड (वाराणसी), रामगढ़ (चंदौली), देवल (गाजीपुर) तथा हरिहरपुर (जौनपुर) में चार औघड़ गद्दियाँ कायम कीं। इन प्रमुख स्थानों के अतिरिक्त तकिया भी कितनी ही हैं।

 

चिकित्सकीय सेवा 20×7घंटे रही उपलब्ध

प्रभारी चिकित्सधिकारी चहनियां संदीप के नेतृत्व में 20×7 घंटे चिकित्सकीय सेवा निःशुल्क चलती रही जिसमें आसपास के लोगे सहित मेले में आये हुए कर्मचारिये, अधिकारियांे, व श्रद्धालुओं की दवा व इलाज करते रहे। वही उन्होने कहा कि इस समय संक्रमण का दौर चल रहा है आप लोग उबला हुआ पानी का सेवन करे और रात्रि खुले आसमान के नीचे न सोए। साथ ही अपनी खान पान पर विशेष सावधनी बरते मेल की अनावश्यक खाद्य पदार्थ के सेवन का परहेज करे।

 ये लोग रहे उपस्थित

इस दौरान केंद्र व्यवस्थापक व्यवस्थापक मेजर अशोक सिंह, अरुण सिंह, धनञ्जय सिंह, लल्ला सिंह, इन्द्रेश कुमार, रूबी सिंह, धनन्जय सिंह उर्फ धन जी, कुलदीप वर्मा, मिथिलेश सिंह, संतोष पटेल, अनिल पांडेय, बुज्जा पांडेय, दिनेश सोनकर, सुनील विश्वकर्मा, अशोक मौर्य, नन्दू गुप्ता, संदीप पाटिल, आदि उपस्थित रहे।

Sach ki Dastak

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x