‘अभयदानेश्वर’ थे पद्मविभूषण डॉ. सलीम अली जी

[एक शिकारी का हृदय परिवर्तन कुछ ऐसा हुआ कि वह पक्षियों को अभयदान और प्रेम में कुछ ऐसा डूबा कि वह विश्व प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक बना।यदि बनना है पक्षी वैज्ञानिक तो सर्वप्रथम हृदय को करूणा से भरना होगा।]



महान पक्षी वैैज्ञानिक आदरणीय डॉ सलीम अली जी

आज पूरी दुनिया में पशु पक्षियों का उत्पीड़न जिस बर्बरता से किया जा रहा है उसे देखकर किसी भी दयावान व्यक्ति का हृदय कांप जाता है। पशु पक्षियों पर होने वाली क्रूरता और अत्याचार मनुष्यता पर घोर कलंक है। जिस प्रकार हम पृथ्वी पर आयें हैं बिल्कुल उसी तरह पशु पक्षियों को भी सर्वशक्तिमान परमात्मा ने रचा है। हम इंसान प्रकृति के दोहन में क्रूरता का परिचय दे रहे हैं। हम मनुष्य समय रहते न सुधरे तो हमें प्रकृति का कोप झेलने को तैयार रहना चाहिए। इसी धरती पर ऐसे भी शिकारी हुए जिनका हृदय परिवर्तन हो गया। जब शिकारियों का हृदय परिवर्तन हो सकता है तो हम और आपका क्यों नहीं। हमें किसी को भी दर्द देना कहां तक शोभा देता है। ईश्वर का प्रसाद स्वरूप प्रसिद्धि भी सिर्फ उसे प्राप्त होती है जो उसका सही पात्र होता है और हमें वह पात्र बनना चाहिये। हमें ऐसा इंसान बनना चाहिये कि कोई भी पशु पक्षी मानव हम से भयभीत न हो बल्कि प्रेम से हमारे पास आ बैठे। हम आपको बताते हैं कि महान भारतीय पक्षी वैज्ञानिक के बारे में जिन्होंने सब पशु पक्षियों से अपने जीवन के अंतिम पलों तक प्रेम किया और सारी दुनिया को प्रकृति में मौजूद पक्षियों के प्रति सद्भावनापूर्ण मानवता का व्यवहार करें, इस दिशा में सबको जगाते रहे। हम बात कर रहे विश्व के महान पक्षी वैज्ञानिक डॉ. सलीम अली जी की जिनका पूरा नाम पूरा नाम डॉ सलिम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली था और
जिनका जन्म मुंबई के एक सुलेमानी बोहरा मुस्लिम परिवार में 12 नवम्बर 1896 में हुआ। जब वे एक साल के थे तब उनके पिता मोइज़ुद्दीन चल बसे और जब वे तीन साल के हुए तब उनकी माता ज़ीनत-उन-निस्सा की भी मृत्यु हो गई। सलीम और उनके भाई-बहनों की देख-रेख उनके मामा अमिरुद्दीन तैयाबजी और चाची हमिदा ने की। बचपन से सलीम जी ने संघर्ष ही संघर्ष किया और इन्हीं कष्टों ने आज उन्हें दुनिया का हीरा जैसा चमकता व्यक्तित्व प्रदान किया। बता दें कि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) के सचिव डबल्यू.एस. मिलार्ड ने सलीम के अन्दर पक्षियों के प्रति अभय और प्रेम की जिज्ञासा बढ़ाई और बालक सलीम को पक्षियों के अध्ययन के लिए उत्साहित किया जिसके स्वरुप सलीम ने गंभीर अध्ययन करना शुरू किया। मिलार्ड ने सोसायटी में संग्रहीत सभी पक्षियों को सलीम को दिखाना प्रारंभ किया और पक्षियों के संग्रहण के लिए प्रोत्साहित भी किया। उन्होंने सलीम को कुछ किताबें भी दी जिसमें ‘कॉमन बर्ड्स ऑफ मुंबई’ भी शामिल थी। उन्होंने ने ही युवा सलीम की मुलाकात नोर्मन बॉयड किनियर से करवाई, जो कि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी में प्रथम पेड क्यूरेटर थे।सलीम की प्रारंभिक रूचि शिकार से संबंधित किताबों पर थी जो बाद में स्पोर्ट-शूटिंग की दिशा में आ गई पर धीरे-धीरे वह पक्षियों से प्रेम करने लगे और उन्हें अभय देने लगे और मेरे शब्दों में कहूं तो डॉ सलीम अली जी महान अभयदानेश्वर उपाधि केे पात्र थे हकदार थे जो मैं मेरे शब्दों से उन्हें लेख के टाईटल के माध्यम से ससम्मान समर्पित कर सकती हूं क्योंकि जिन्होंने हमारे देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन कर दिया, प्रसिद्ध कर दिया।तो इतना सम्मान तो हम उनका कर ही सकते हैं। जिन्होंने लाखों पक्षियों के प्राणों की रक्षा की और अनगिनत शोध किये। आप देखें कि आज भी गूगल पक्षी प्रेमियों में पहली तस्वीर डॉ. सलीम अली की ही दिखाता है।बता दें कि सलीम अली जी ने प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से ग्रहण की पर कॉलेज का पहला साल ही मुश्किलों भरा था जिसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और परिवार के वोलफ्रेम (टंग्सटेन) माइनिंग और इमारती लकड़ियों के व्यवसाय की देख-रेख के लिए टेवोय, बर्मा (टेनासेरिम) चले गए। यह स्थान सलीम के अभिरुचि में सहायक सिद्ध हुआ क्योंकि यहाँ पर घने जंगले थे जहाँ इनका मन तरह-तरह के परिन्दों को देखने में लगता रहा।लगभग 7 साल बाद सलीम अली मुंबई वापस लौट गए और पक्षी शास्त्री विषय में प्रशिक्षण लिया और बंबई के ‘नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के म्यूज़ियम में गाइड के पद पर नियुक्त हो गये। बहुत समय बाद इस कार्य में उनका मन नहीं लगा तो अवकाश लेकर जर्मनी जाकर पक्षी विज्ञान में उच्च प्रशिक्षण प्राप्त किया। जब एक साल बाद भारत लौटे तब पता चला कि इनका पद ख़त्म हो चुका था। सलीम अली की पत्नी के पास कुछ रुपये थे जिससे उन्होंने बंबई बन्दरगाह के पास किहिम नामक स्थान पर एक छोटा सा मकान ले लिया।डॉ सलीम अली ने अपना पूरा जीवन पक्षियों के लिए समर्पित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि सलीम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली परिंदों की ज़ुबान समझने लगे थे। उन्होंने पक्षियों के अध्ययन को आम जनमानस से जोड़ा और कई पक्षी विहारों की तामीर में अग्रणी भूमिका निभाई।पक्षियों के सर्वेक्षण में 65 साल गुजार देने वाले इस डॉ सलीम अली को परिंदों का चलता फिरता विश्वकोष कहा जाता था।उन्होंने पक्षियों की अलग-अलग प्रजातियों के बारे में अध्ययन के लिए देश के कई भागों और जंगलों में भ्रमण किया। कुमाऊँ के तराई क्षेत्र से डॉ अली ने बया पक्षी की एक ऐसी प्रजाति ढूंढ़ निकाली जो लुप्त घोषित हो चुकी थी। साइबेरियाई सारसों की एक-एक आदत की उनको अच्छी तरह पहचान थी। उन्होंने ही अपने अध्ययन के माध्यम से बताया था कि साइबेरियन सारस मांसाहारी नहीं होते, बल्कि वे पानी के किनारे पर जमी काई खाते हैं। वे पक्षियों के साथ दोस्ताना व्यवहार करते थे और उन्हें बिना कष्ट पहुंचाए अभयदान देते हुए जानकारी के लिए भी पकड़ा जा सकता है और उन्होंने पक्षियों को बिना दुख दिये पकड़ने के 100 से भी ज़्यादा तरीक़े उनके पास थे। पक्षियों को पकड़ने के लिए डॉ सलीम अली ने प्रसिद्ध ‘गोंग एंड फायर’ व ‘डेक्कन विधि’ की खोज की जिन्हें आज भी पक्षी विज्ञानियों द्वारा प्रयोग किया जाता है।उन्हें बर्डमैन ऑफ़ इंडिया कहकर सम्बोधित किया जाता है।जर्मनी के ‘बर्लिन विश्वविद्यालय’ में उन्होंने प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक इरविन स्ट्रेसमैन के देख-रेख में काम किया। उसके बाद सन 1930 में वे भारत लौट आये और फिर पक्षियों पर और तेजी से कार्य प्रारंभ किया। देश की आज़ादी के बाद डॉ सलीम अली ‘बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी’ (बीएनएसच) के प्रमुख लोगों में रहे। भरतपुर पक्षी विहार की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही।सन 1930 में सलीम अली ने अपने अनुसन्धान और अध्ययन पर आधारित लेख लिखे। इन लेखों के माध्यम से लोगों को उनके कार्यों के बारे में पता चला और उन्हें एक ‘पक्षी शास्त्री’ के रूप में पहचाना मिली। लेखों के साथ-साथ सलीम अली ने कुछ पुस्तकें भी लिखीं। वे जगह जगह जाकर पक्षियों के बारे में जानकारी इकठ्ठी करते थे। उन्होंने इन जानकारियों के आधार पर एक पुस्तक तैयार की जिसका नाम था ‘द बुक ऑफ़ इंडियन बर्ड्स’। सन 1941 में प्रकाशित इस पुस्तक ने रिकॉर्ड बिक्री की। इसके बाद उन्होंने एक दूसरी पुस्तक ‘हैण्डबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एण्ड पाकिस्तान’ भी लिखी, जिसमें सभी प्रकार के पक्षियों, उनके गुणों-अवगुणों, प्रवासी आदतों आदि से संबंधित अनेक रोचक और मतवपूर्ण जानकारियां दी गई थी। डॉ सलीम अली ने एक और पुस्तक ‘द फाल ऑफ़ ए स्पैरो’ भी लिखी, जिसमें उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी कई घटनाओं का ज़िक्र किया है। डॉ सलीम अली ने प्रकृति विज्ञान और पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस दिशा में उनके कार्यों के मद्देनजर उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान दिए गए। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी। उनके महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए उन्हें भारत सरकार ने भी उन्हें सन 1958 में पद्म भूषण व 1976 में पद्म विभूषण जैसे महत्वपूर्ण नागरिक सम्मानों से नवाजा गया। 27 जुलाई 1987 को 91 साल की उम्र में डॉ. सालिम अली का निधन मुंबई में हुआ। डॉ सलीम अली भारत में एक ‘पक्षी अध्ययन व शोध केन्द्र’ की स्थापना करना चाहते थे। इनके महत्वपूर्ण कार्यों और प्रकृति विज्ञान और पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में अहम् योगदान के मद्देनजर ‘बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ और ‘पर्यावरण एवं वन मंत्रालय’ द्वारा कोयम्बटूर के निकट ‘अनाइकट्टी’ नामक स्थान पर ‘सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केन्द्र’ स्थापित किया गया। आज जो युवा वैज्ञानिक इस दिशा में अपने कदम रख रहें हैं बता दूं कि उन्हें पहले यह सोचना होगा कि जिन गधों पर ईंटें ढ़ोयीं जातीं हैं और घोड़ियों तांगे इक्के में सवारियाँ के बोझ से उनका जीवन कितना दर्दमय है। उन्हें भी बीमारियों के दर्द सतातें हैं। कभी-कभी तो भारी बोझ उठाने पर उनका गर्भपात तक हो जाता है तो कभी-कभी ईंटों सड़कों पर बिखर जाती हैं और उनके बच्चे सड़कों पर ही हो जाते हैं। सच है कि इनके लिये अस्पताल में बैड रिजर्व नहीं है पर हम आप के हृदय में इन मासूम जीव जन्तु पशु पक्षियों के प्रति संवेदना का एक कोना तो रिजर्व होना चाहिए। सर्वप्रथम अपने हृदय में प्रभु श्री महावीर स्वामी जी कि अंहिसा के उपदेशों को अपने हृदय में धारण करना होगा तभी उनकी महान पक्षी वैज्ञानिक बनने व एक सच्चा इंसान बनने की यह यात्रा सफल होगी।बता दें कि पीर हजरत अली जी ने कहा है कि तू अपने पेट को पशु पक्षियों की कब्र मत बना। प्रभु ईसामसीह ने कहा है कि तुझे संसार की सारी जड़ चेतना प्रकृति का ज्ञान क्यों न हो पर तेरे हृदय में दया नहीं तो तेरा ज्ञान परमात्मा के सम्मुख किसी काम न आयेगा। यहूदी में कहा गया कि बकरों के रक्त से नहीं अपने परिश्रम पुरूषार्थ से मोक्ष मिलता है। हिंदू में भी बलि को गलत और पाप बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने तो यहां तक कहा है कि जो खिलाने वाला दुखी मन से भोजन परोसे या वह पापी जिसने मनुष्यता को शर्मिंदा किया हो और पशु पक्षियों और प्रकृति को दर्द दिया है तो उस घर भोजन तक नहीं करना चाहिए।सच तो यही है कि सर्वप्रथम हम इंसान होगें तो महान पशु पक्षी वैज्ञानिक भी होगें।

 

               _ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना, सच की दस्तक राष्ट्रीय मासिक पत्रिका वाराणसी, उत्तर प्रदेश 

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