निर्भया और न्याय? ✍️नीरज कुमार द्विवेदी

उडगन मध्य उजाला चंद्र का भी स्वस्थ होता है
झूठों की अमावस का ये तारा भक्त होता है
भरोसा रखो हर पल ही, न्यायिक प्रक्रिया में तुम
उदित होता सत्य रवि जब झूठ सब पस्त होता है।
मूरत थी वो देवी की न समझा तुमने बात है और
दानव बन गए थे तुम कभी मानव थे बात है और
चढ़ा था भूत छः के सिर सुना कुछ भी नहीं तुमने
वो रोई, गिड़गिड़ाई या चिल्लाई बात  है ये और।
रोई होगी वो माँ भी जाया था तुम्हें जिसने
तड़पा होगा वो भी तात पाया था तुम्हें जिसने
जाया होके नारी से नहीं समझा तू नारी को
खुदा पछताया भी होगा बनाया था तुझे जिसने।
कहाँ सोचा था तब तुमने तेरा अंजाम ये होगा
तेरे सर पर भयंकर मौत का पैगाम ये होगा
ट्रायल कोर्ट फैसले पर नही सोचा था तब कोई
छः – छः साल बचाने को तुझे संग्राम ये होगा।।
      ✍️नीरज कुमार द्विवेदी
गन्नीपुर – श्रृंगीनारी, बस्ती (उत्तरप्रदेश)

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