“दूषित होती हवा तथा पृथ्वी का भविष्य”

 मां प्रकृति ने मानव को कई बहारों से सजाया है।   इन सब में मानव शरीर भी एक  महत्वपूर्ण उपहार है। शरीर जल, वायु, आकाश, अग्नि, पृथ्वी से मिलकर बना है। ज़रा विचार कीजिये यदि इनमें से एक भी तत्व दूषित हो जाए तो मानव शरीर पर  ठीक वैसे ही प्रभाव पड़ता है, जैसा बिना सिंचाई, खेत की   उरवरता पर पड़ता है। 
                शायद इन्ही सभी बातों को ध्यान में रखते हुए वेदीय काल से ही हमारे ऋषि मुनियों ने  मां प्रकृति के स्त्रतो को आरक्षित करने पर अधिक बल दिया, इसका प्रमाण प्राचीन गृन्थो में भी देखने को मिलता है। उस काल के लोग शायद न्यूटन के तीसरे सिद्धांत को अच्छे से समझते होंगे की जो हम प्रकृति को देंगे, एक दिन वापिस हमारे पास आयेगा। इसिलिए उस काल में उन्होंने प्राकृतिक सन्साधनों का दोहन करने की वजाए सम्वर्धन् किया। उन्होंने प्राकृतिक  विरासत को ही असली विरासत माना और इस काल के मानव के लिए शुद्ध वायु, पानी, हरि-भरी धरती छोड़ी। यह अमूल्य खजाना न तो एकदम इकठा किया जा सकता है, न ही किसी करखाने में बनाया जा सकता है। 
                         प्रकृति को संजोने वाली  मानव प्रजाति आज प्राकृति का दोहोन करने वाली बन गयी है। न्यूटन का तीसरा नियम किताबों तक ही सीमित रह गया है और व्यवहार से विलीन हो गया है। मानव प्राकृति के अमूल्य  तत्व का दोहन करने से तनिक भी हिचकीचाहट नहीं कर रहा है। इसका खामिया क्या होगी इसका अंदाजा हाल ही में प्रकाशित स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट, 2020 से लगाया जा सकता है।इसमें बताया गया है कि भारत में 2019 में वायु प्रदूषण से 16.7 लाख लोगों की मौत हुई है, जिनमें से एक लाख से अधिक की उम्र एक महीने से कम थी।स्टेट यह रिपोर्ट अमेरिका के एक गैर सरकारी संगठन ‘हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट’  द्वारा जारी किया जाता है।
स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर रिपोर्ट 2020 भारत सहित पूरी दुनिया पर वायु प्रदूषण की स्थिति को बताती है।इस रिपोर्ट  में कहा गया है कि भारत में स्वास्थ्य पर सबसे बड़ा खतरा वायु प्रदूषण है। बाहरी एवं घर के अंदर पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण के कारण 2019 में नवजातों की पहले ही महीने में मौत की संख्या एक लाख 16 हजार से अधिक थी। इन मौतों में से आधे से अधिक बाहरी वातावरण के पीएम 2.5 से जुड़ी हुई हैं और अन्य खाना बनाने में कोयला, लकड़ी और गोबर के इस्तेमाल के कारण होने वाले प्रदूषण से जुड़ी हुई हैं।
2020 की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वायु प्रदूषण और हृदय एवं फेफड़ा रोग के बीच संबंध होने का स्पष्ट साक्ष्य है।नवजात शिशुओं में 21 फीसदी मौत का कारण घर एवं आसपास का वायु प्रदूषण है। इसीलिए वायु प्रदूषण अब मौत के लिए सबसे बड़ा खतरा वाला कारक बन गया है।
भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल सहित दक्षिण एशियाई देश उन शीर्ष दस राष्ट्रों में शामिल हैं जहां 2019 में पीएम 2.5 का स्तर सर्वाधिक रहा है। इन सभी देशों में 2010 से 2019 के बीच घर के बाहर पीएम 2.5 का बढ़ा हुआ स्तर महसूस किया गया।दिल और फेफड़ों से संबन्धित वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों को कोरोना वायरस से संक्रमित होने का काफी अधिक खतरा रहता है।
यह रिपोर्ट पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण की स्थित को बताती है।वायु प्रदूषण, वातावरण में ज़हरीले रसायनों, जैविक कचरे और विषाक्त पदार्थों के पहुँचने से होता है। वायुमंडल की गैसों के विभिन्न घटकों की आदर्श स्थिति में रासायनिक रूप से होने वाला अवांछनीय परिवर्तन को वायु प्रदूषण की संज्ञा दी जाती है । यह वायु प्रदूषण वातावरण/पर्यावरण को किसी-न-किसी रूप में दुष्प्रभावित करता है। 
जीवाश्म ईंधन के जलने से वातावरण में सल्फर ऑक्साइडसलफ्यूरिक अम्ल, हाइड्रोजन सल्फाइड  और कार्बन-डाइ- ऑक्साइड  आदि गैसें विमुक्त होती है।ऑटोमोबाइल और थर्मल पॉवर प्लांट से नाइट्रस ऑक्साइड , नाइट्रोजन ऑक्साइड , कॉर्बन-मोनो-ऑक्साइड , नाइट्रिक अम्ल विमुक्त होती है। उद्योग, ऑटोमोबाइल से धातु निकिल, आर्सेनिक और सीसा  आदि तथा फ्लोराइड और प्रकाश रासायनिक धुंध आदि विमुक्त  होती हैं। 
दरअसल भारत में PM 2.5 यानी पार्टिकुलेट मैटर का बढ़ता स्तर वायु प्रदूषण के लिहाज से सबसे गंभीर समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक PM 2. 5 की सुरक्षित सीमा – 40 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब निर्धारित की गयी है, जबकि देश की राजधानी दिल्ली में ये स्तर अक्सर ही 200 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब के करीब बना रहता है।पार्टिकुलेट मैटर वायुमंडल में निष्क्रिय अवस्था में होते हैं, जोकि अतिसूक्ष्म होने के कारण साँसों के ज़रिये हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और कई जानलेवा बीमारियों का कारण बनते हैं।
भारत में, वायु प्रदूषण के प्राथमिक कारण वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्य और विध्वंस स्थल से उत्पन्न धूल  बायोमास जलाना, खराब अपशिष्ट प्रबंधन और फसलों के अवशेष जलाना हैं।जब ये उपर्युक्त कारक भौगोलिक और मौसम संबंधी कारकों के साथ मिल जाते हैं, तो सर्दियों के दौरान उत्तर भारत में प्रदूषण बढ़ जाता है।
                    हर वर्ष इस तरह की चोंकाने वाली रिपोर्ट यदि मानव की आँखें अभी भी नहीं खोल पायी तो आने वाले भयानक समय के लिए  मानव जाती को  तैयार रहना होगा।  याद रहे हमें दमड़ी हासिल करने के चक्कर में चमड़ी नहीं खोनी है।
यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है की जीडीपी और पर कैपिटा इनकम के उछलते हुए आंकड़े ही सबकुछ नहीं होते। हम भले ही कछुए की चाल से वृद्धि करें लेकिन याद रखना चाइये कि जीत भी तो कछुए की ही होती है।अत: मानव जाती को समय रहते सम्भलने की ज़रूरत है नहीं तो प्राकृतिक के इस दंश  से मानव प्रजाति को फिर न तो कोई संञ्जवनी बचा सकती है न तो विज्ञान का कोई चमतकार। 
   
____रोहित कुमार
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