दलबदल कानून में बदलाव से ही लोकतंत्र हो सकता है सुरक्षित
ब्रजेश कुमार
संपादक सच की दस्तक
संपादकीय
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है। जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करके प्रतिनिधियों को चुनती है और यह अपेक्षा करती है कि जिस विचारधारा, नीति और दल के आधार पर उसने अपना समर्थन दिया है, उसका सम्मान किया जाएगा। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वर्ष 1985 में दलबदल विरोधी कानून लागू किया गया था। इस कानून का मूल उद्देश्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा स्वार्थवश दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना था। लेकिन 41 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह कानून अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह प्राप्त करने में सफल नहीं दिखाई देता। इसका कारण केवल कानून की कमियां ही नहीं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता का लगातार कमजोर होना भी है।
किसी भी लोकतंत्र में कानून तभी प्रभावी होता है जब उसके साथ नैतिक मूल्यों का पालन भी किया जाए। यदि राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि केवल कानूनी रास्ते खोजकर जनता के जनादेश की भावना को दरकिनार करने लगें, तो कानून का उद्देश्य स्वतः कमजोर पड़ जाता है। आज देश की राजनीति में जो घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं, वे इसी चिंता को सामने लाते हैं।
पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राजनीति इसके प्रमुख उदाहरण हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर लगातार टूट की खबरें सामने आती रही हैं, वहीं महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना में जो विभाजन हुआ और उसके बाद जो राजनीतिक परिस्थितियां बनीं, उसने दलबदल कानून की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इन घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वर्तमान दलबदल कानून वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा कर पा रहा है या फिर राजनीतिक दलों और नेताओं ने इसके भीतर ऐसे रास्ते खोज लिए हैं जिनसे जनता के जनादेश की मूल भावना को ही बदल दिया जाता है।
जब कोई उम्मीदवार किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिन्ह पर जनता के बीच जाता है, तब जनता केवल व्यक्ति को नहीं बल्कि उस दल की विचारधारा, नीतियों और राजनीतिक दिशा को भी वोट देती है। यदि जनता ने किसी दल को इसलिए समर्थन दिया कि वह किसी विशेष गठबंधन या राजनीतिक शक्ति का विरोध कर रहा है, तो चुनाव जीतने के बाद उसी दल या उसके प्रतिनिधियों का विरोधी खेमे में जाकर खड़ा हो जाना लोकतांत्रिक भावना के विपरीत माना जाना चाहिए।
जनता यह सोचकर वोट देती है कि उसका प्रतिनिधि उसके विचारों का प्रतिनिधित्व करेगा। लेकिन जब निर्वाचित सांसद या विधायक चुनाव के बाद राजनीतिक परिस्थितियों का हवाला देकर दल बदल लेते हैं या बड़ी संख्या में अलग गुट बनाकर किसी दूसरे गठबंधन के साथ खड़े हो जाते हैं, तब जनता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करती है। यह केवल राजनीतिक बदलाव नहीं होता, बल्कि मतदाताओं के विश्वास के साथ भी एक प्रकार का समझौता होता है।
यह सही है कि समय के साथ विचार बदल सकते हैं। किसी जनप्रतिनिधि को अपनी पार्टी की नीतियों से असहमति हो सकती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना समर्थन का। लेकिन प्रश्न यह है कि यदि किसी सांसद या विधायक को अपनी पार्टी की विचारधारा या नेतृत्व स्वीकार नहीं है, तो लोकतांत्रिक और नैतिक रास्ता क्या होना चाहिए?
मेरे विचार से ऐसी स्थिति में सबसे उचित मार्ग यह होना चाहिए कि संबंधित जनप्रतिनिधि पहले अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दें और फिर जनता के बीच जाकर नया जनादेश प्राप्त करें। यदि उनके विचारों में बदलाव आया है और जनता उन विचारों से सहमत है, तो वह उन्हें दोबारा चुनकर सदन में भेज देगी। इससे लोकतंत्र भी मजबूत होगा और जनता का विश्वास भी कायम रहेगा। लेकिन बिना इस्तीफा दिए, केवल संख्या बल के आधार पर पार्टी तोड़कर सत्ता के किसी दूसरे खेमे में शामिल हो जाना जनता की भावना के साथ न्याय नहीं माना जा सकता।
वर्तमान दलबदल कानून में दो-तिहाई सदस्यों के अलग होकर नए समूह के रूप में मान्यता पाने का जो प्रावधान व्यवहार में दिखाई देता है, वह कई बार जनादेश की भावना को प्रभावित करता है। इसी कारण आज आवश्यकता महसूस की जा रही है कि इस कानून की पुनः समीक्षा की जाए। लोकतंत्र की मजबूती के लिए कानून को और अधिक स्पष्ट तथा कठोर बनाने की जरूरत है।
दलबदल कानून में ऐसा संशोधन होना चाहिए कि कोई भी सांसद या विधायक जिस राजनीतिक दल के टिकट पर निर्वाचित हुआ है, यदि वह उस दल को छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाए। यह नियम इस बात से प्रभावित नहीं होना चाहिए कि उसके साथ कितने सदस्य हैं। चाहे एक सदस्य हो या दो-तिहाई सदस्य, यदि वे मूल दल छोड़ रहे हैं तो उन्हें पुनः जनता के बीच जाकर जनादेश प्राप्त करना चाहिए। यही लोकतांत्रिक मर्यादा और जनभावना का सम्मान होगा।
लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास का भी नाम है। यदि जनता के मत को तकनीकी प्रावधानों के माध्यम से बदला जाने लगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है। इसलिए समय की मांग है कि दलबदल कानून को और प्रभावी बनाया जाए तथा जनप्रतिनिधियों को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाए।
अंततः यह किसी एक दल, एक राज्य या किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा का प्रश्न नहीं है। आज जो स्थिति किसी एक दल के साथ है, कल वही किसी दूसरे दल के साथ भी हो सकती है। इसलिए इस विषय को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखने की आवश्यकता है। लोकतंत्र की वास्तविक रक्षा तभी संभव है जब जनता के जनादेश को सर्वोच्च माना जाए और उसे बदलने का अधिकार केवल जनता के पास रहे। दलबदल कानून में आवश्यक बदलाव इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
किसी भी लोकतंत्र में कानून तभी प्रभावी होता है जब उसके साथ नैतिक मूल्यों का पालन भी किया जाए। यदि राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि केवल कानूनी रास्ते खोजकर जनता के जनादेश की भावना को दरकिनार करने लगें, तो कानून का उद्देश्य स्वतः कमजोर पड़ जाता है। आज देश की राजनीति में जो घटनाक्रम देखने को मिल रहे हैं, वे इसी चिंता को सामने लाते हैं।
पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राजनीति इसके प्रमुख उदाहरण हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर लगातार टूट की खबरें सामने आती रही हैं, वहीं महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना में जो विभाजन हुआ और उसके बाद जो राजनीतिक परिस्थितियां बनीं, उसने दलबदल कानून की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इन घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वर्तमान दलबदल कानून वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा कर पा रहा है या फिर राजनीतिक दलों और नेताओं ने इसके भीतर ऐसे रास्ते खोज लिए हैं जिनसे जनता के जनादेश की मूल भावना को ही बदल दिया जाता है।
जब कोई उम्मीदवार किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिन्ह पर जनता के बीच जाता है, तब जनता केवल व्यक्ति को नहीं बल्कि उस दल की विचारधारा, नीतियों और राजनीतिक दिशा को भी वोट देती है। यदि जनता ने किसी दल को इसलिए समर्थन दिया कि वह किसी विशेष गठबंधन या राजनीतिक शक्ति का विरोध कर रहा है, तो चुनाव जीतने के बाद उसी दल या उसके प्रतिनिधियों का विरोधी खेमे में जाकर खड़ा हो जाना लोकतांत्रिक भावना के विपरीत माना जाना चाहिए।
जनता यह सोचकर वोट देती है कि उसका प्रतिनिधि उसके विचारों का प्रतिनिधित्व करेगा। लेकिन जब निर्वाचित सांसद या विधायक चुनाव के बाद राजनीतिक परिस्थितियों का हवाला देकर दल बदल लेते हैं या बड़ी संख्या में अलग गुट बनाकर किसी दूसरे गठबंधन के साथ खड़े हो जाते हैं, तब जनता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करती है। यह केवल राजनीतिक बदलाव नहीं होता, बल्कि मतदाताओं के विश्वास के साथ भी एक प्रकार का समझौता होता है।
यह सही है कि समय के साथ विचार बदल सकते हैं। किसी जनप्रतिनिधि को अपनी पार्टी की नीतियों से असहमति हो सकती है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना समर्थन का। लेकिन प्रश्न यह है कि यदि किसी सांसद या विधायक को अपनी पार्टी की विचारधारा या नेतृत्व स्वीकार नहीं है, तो लोकतांत्रिक और नैतिक रास्ता क्या होना चाहिए?
मेरे विचार से ऐसी स्थिति में सबसे उचित मार्ग यह होना चाहिए कि संबंधित जनप्रतिनिधि पहले अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दें और फिर जनता के बीच जाकर नया जनादेश प्राप्त करें। यदि उनके विचारों में बदलाव आया है और जनता उन विचारों से सहमत है, तो वह उन्हें दोबारा चुनकर सदन में भेज देगी। इससे लोकतंत्र भी मजबूत होगा और जनता का विश्वास भी कायम रहेगा। लेकिन बिना इस्तीफा दिए, केवल संख्या बल के आधार पर पार्टी तोड़कर सत्ता के किसी दूसरे खेमे में शामिल हो जाना जनता की भावना के साथ न्याय नहीं माना जा सकता।
वर्तमान दलबदल कानून में दो-तिहाई सदस्यों के अलग होकर नए समूह के रूप में मान्यता पाने का जो प्रावधान व्यवहार में दिखाई देता है, वह कई बार जनादेश की भावना को प्रभावित करता है। इसी कारण आज आवश्यकता महसूस की जा रही है कि इस कानून की पुनः समीक्षा की जाए। लोकतंत्र की मजबूती के लिए कानून को और अधिक स्पष्ट तथा कठोर बनाने की जरूरत है।
दलबदल कानून में ऐसा संशोधन होना चाहिए कि कोई भी सांसद या विधायक जिस राजनीतिक दल के टिकट पर निर्वाचित हुआ है, यदि वह उस दल को छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाए। यह नियम इस बात से प्रभावित नहीं होना चाहिए कि उसके साथ कितने सदस्य हैं। चाहे एक सदस्य हो या दो-तिहाई सदस्य, यदि वे मूल दल छोड़ रहे हैं तो उन्हें पुनः जनता के बीच जाकर जनादेश प्राप्त करना चाहिए। यही लोकतांत्रिक मर्यादा और जनभावना का सम्मान होगा।
लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास का भी नाम है। यदि जनता के मत को तकनीकी प्रावधानों के माध्यम से बदला जाने लगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है। इसलिए समय की मांग है कि दलबदल कानून को और प्रभावी बनाया जाए तथा जनप्रतिनिधियों को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाए।
अंततः यह किसी एक दल, एक राज्य या किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा का प्रश्न नहीं है। आज जो स्थिति किसी एक दल के साथ है, कल वही किसी दूसरे दल के साथ भी हो सकती है। इसलिए इस विषय को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखने की आवश्यकता है। लोकतंत्र की वास्तविक रक्षा तभी संभव है जब जनता के जनादेश को सर्वोच्च माना जाए और उसे बदलने का अधिकार केवल जनता के पास रहे। दलबदल कानून में आवश्यक बदलाव इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
