विकास का रोना रोए जनता, विकास का ढिंढोरा पीटें जनप्रतिनिधि
सच की दस्तक डिजिटल न्यूज डेस्क
पीडीडीयू (चन्दौली) लोकतंत्र में विकास किसी भी जनप्रतिनिधि के कार्यों का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है। चुनाव के समय जनता विकास के वादों पर विश्वास कर अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और बदले में बेहतर सुविधाओं, सुगम यातायात, स्वच्छ वातावरण तथा आधुनिक नागरिक सुविधाओं की अपेक्षा करती है। लेकिन विडंबना यह है कि जहां जनता विकास के अभाव का दर्द बयां कर रही है, वहीं जनप्रतिनिधि विकास के बड़े-बड़े दावे करते नहीं थकते। पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर (मुगलसराय) इसका एक जीवंत उदाहरण बनता जा रहा है।
किसी भी शहर की पहली आवश्यकता होती है जाम मुक्त यातायात व्यवस्था। इसके लिए दोपहिया और चारपहिया वाहनों की पर्याप्त पार्किंग व्यवस्था होना आवश्यक है, ताकि लोग बाजार में खरीदारी के लिए जाएं तो उन्हें वाहन खड़ा करने की चिंता न हो और न ही चालान का भय सताए। इसके साथ ही टोटो, टेंपो, विक्रम और अन्य व्यावसायिक वाहनों के लिए अलग स्टैंड होना चाहिए, जिससे वे सड़कों पर खड़े होकर यातायात बाधित न करें। लेकिन नगर की वास्तविकता यह है कि अधिकांश वाहन सड़क किनारे खड़े दिखाई देते हैं और यही स्थिति जाम की सबसे बड़ी वजह बनती है।
इसी प्रकार सब्जी और फल विक्रेताओं के लिए भी नियोजित स्थान होना चाहिए। जब ऐसी व्यवस्था नहीं होती तो ठेले और दुकानें स्वतः ही सड़कों पर फैल जाती हैं, जिससे बाजार की सड़कें संकरी हो जाती हैं और लोगों को आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ता है। आज नगर के अधिकांश बाजारों में यही दृश्य देखने को मिलता है।
विकास केवल सड़क और भवन बनाने तक सीमित नहीं होता। एक विकसित शहर वह होता है जहां नागरिकों के स्वास्थ्य और मनोरंजन का भी ध्यान रखा जाए। सुबह की सैर करने वाले बुजुर्गों, युवाओं और महिलाओं के लिए पार्क होने चाहिए, जहां लोग टहल सकें, योग कर सकें और कुछ समय प्रकृति के बीच बिता सकें। बच्चों और खिलाड़ियों के लिए खेल मैदान होना चाहिए ताकि उनकी प्रतिभा को उचित मंच मिल सके। दुर्भाग्यवश पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर में ऐसी सुविधाएं लगभग नदारद हैं। नगरवासियों को पार्क और खेल मैदान जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए भी रेलवे अथवा अन्य संस्थाओं की कृपा पर निर्भर रहना पड़ता है।
शिक्षा किसी भी क्षेत्र के विकास की रीढ़ होती है। बढ़ती आबादी के अनुरूप सरकारी हिंदी एवं अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की पर्याप्त संख्या होनी चाहिए, ताकि हर वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। लेकिन इस दिशा में भी अपेक्षित प्रयास दिखाई नहीं देते।
नगर की एक और बड़ी समस्या पार्किंग और यातायात प्रबंधन की है। सार्वजनिक पार्किंग की समुचित व्यवस्था न होने के कारण लोग मजबूरी में सड़क किनारे वाहन खड़ा करते हैं और बाद में चालान की कार्रवाई का सामना करते हैं। जनता का सवाल है कि जब पार्किंग की व्यवस्था ही नहीं है तो आखिर वाहन कहां खड़े किए जाएं? इसी तरह टोटो, टेंपो और अन्य सार्वजनिक वाहनों के लिए निर्धारित स्टैंडों की संख्या और क्षमता भी अपर्याप्त है। परिणामस्वरूप वाहन सड़क पर खड़े रहते हैं और जाम की समस्या दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है।
ऐसे में स्वाभाविक है कि जनता विकास का रोना रोए। जिसने अपने मत का प्रयोग विकास की उम्मीद में किया हो, वह सुविधाओं के अभाव पर सवाल भी उठाएगी। दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे दावों और प्रचार से आगे बढ़कर जमीनी हकीकत को स्वीकार करें और समस्याओं के समाधान के लिए ठोस कदम उठाएं।
विकास का वास्तविक अर्थ केवल शिलान्यास, उद्घाटन और विज्ञापनों तक सीमित नहीं है। विकास तब दिखाई देता है जब शहर जाम से मुक्त हो, पार्किंग की व्यवस्था हो, बच्चों के लिए खेल मैदान हों, बुजुर्गों के लिए पार्क हों, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं सुलभ हों तथा आम नागरिक बिना किसी परेशानी के अपना जीवन व्यतीत कर सके। जब तक ये मूलभूत सुविधाएं धरातल पर नहीं उतरतीं, तब तक जनता के मन में यह प्रश्न उठता रहेगा कि आखिर विकास हुआ कहां है?
जनता की अपेक्षाएं और जनप्रतिनिधियों के दावे जब तक एक-दूसरे से मेल नहीं खाएंगे, तब तक विकास का ढिंढोरा और विकास का रोना—दोनों साथ-साथ चलते रहेंगे।
