सौहार्द शिरोमणि धराधाम प्रमुख गुरूदेव सौरभ पांडेय जी का इंटरव्यू –

फाईल फोटो: इंटरनेशनल धराधाम प्रमुख सौहार्द शिरोमणि गुरूदेव सौरभ पांडेय जी 
मानवताधर्म को ‘कर्मों’ में आत्मसात करना होगा। 
_सौहार्दशिरोमणि  ‘गुरूदेव’  डॉ.सौरभ पाण्डेय जी
उत्तर प्रदेश के शहर गोरखपुर के ग्राम भस्मा – डवरपार में स्थित ‘धराधाम’ परिसर में  धराधाम निर्माणाधीन अवस्था में है। बता दें कि यह वह अद्भुत पुण्यपुंज परिसर है जिसमें सभी धर्मों के आस्था स्थल मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर आदि एक ही परिसर में होगें। जोकि विश्व शांति और आपसी प्रेम और सद्भावना व कौमीएकता का अद्भुत प्रतीक होगा। यह ऐसा परिसर होगा जो पूरी दुनिया को एकता के यानि मानवता के सूत्र में बांधने को कृतसंकल्पित होगा और लोगों को भी इसी मानवीय भावना का वैश्विक संदेश देगा। कहते हैं न कि कलयुगी वैश्विक मंदी की हवा में मुद्रा इतनी नहीं गिरी जितना कि मुद्रा के लिए इंसान की इंसानियत गिर गयी। इसी वैमनस्यता को जड़मूल से उखाड़ फैंकने और इंसानियत को अमरता देने वास्ते सौहार्द शिरोमणि महामनीषी गुरूदेव डॉ. सौरभ पांडेय जी ने अपनी जिंदगी को यज्ञ बनाकर अपनी श्वासों की आहूतियों से मनुर्भव शब्द में छिपी पवित्र अग्नि को प्रज्वलित करके विश्व शांति हेतु धराधाम संस्था के माध्यम से पूरी दुनिया को प्रेम से जोड़ने के प्रति वह कृतसंकल्पित हैं। आइये! अपने इतिहास में झांके तो पता चलता है कि सदियों – सदियों तक कुछ निशाचरी विचारधारा अलगाववादी सोच के लोगों के द्वारा दिये गए दर्द से निवारण दिलाने के लिए इंसानियत के रिसते ज़ख्म पर मरहम बनकर धरती पर प्रेम और सौहार्द की अलख जगाने जमीं पर अवतरित हुई वो दिव्य आत्माएं जिन्हें, क्रमशः, झूलेलाल(1007) , उदेरोलाल, सिद्ध वीर गोगादेव, ख्वाजा गरीब नवाज(1141),  रामदेव यानि रामसा पीर (1352-1385),कबीर (1398-1518), गुरु नानकदेवजी, शिर्डी सांईं बाबा, स्वामी विवेकानंद, गौतमबुद्ध, एनी वेसेन्ट, मदर टेरेसा, नेल्सन मंडेला, के नाम से हम सब जानते हैं। जिन्होंने परिवार, समाज, देश – दुनिया तक प्रेम और मानवता का संदेश दिया। यही कारण है पूरी दुनिया उन्हें उनके सद्कर्मों के कारण भगवान की तरह पूजती है। वो कहते हैं न कि कौन हिंदू, कौन मुस्लिम, कौन सिख सरदार है, चीरकर देखा जब इन नसों को तो खून की धार सिर्फ़ लाल है।
भारत का महान गौरवशाली इतिहास साक्षी रहा है कि अपना देश आदिकाल से ही ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘सर्वजन हिताय’ की भावना में विश्वास रखता आया है। इसी के अनुरूप अमृतसर में स्थित सिखों के सर्वोच्च धर्मस्थल श्री हरि मंदिर साहिब की नींव पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव जी ने एक मुस्लिम ‘संत साईं मियां मीर’ से रखवाई थी। क्योंकि संत, संत होते और उनका सिर्फ एक ही धर्म होता है वो है ‘मानवताधर्म’। 
     यह सर्वविदित है कि हमारी भारतभूमि पावन देवी-देवताओं की जननी मानी गयी है। यहाँ की पावन भूमि से न जाने कितने ही ऋषियों  – मुनियों,  विद्वानों, शूरवीरों व समाजसुधारकों ने जन्म लेकर अपने सुकर्मों से देश-दुनियां को उन्नत सोच के साथ उन्नत दिशारूपी श्रेष्ठ मार्गदर्शन और सर्वहित की उन्नतमानसिकता का परिचय देकर  हमारी भारतभूमि को धन्य किया है और जिनकी विजय, पराक्रम, संघर्ष गाथा युगों – युगों से आज तक वातावरण में संजीवनी घोलते हुए जीवंत है क्योंकि शब्द अमर हैं। सत्य अमर है।  इंसान के सत्कर्म अमर हैं और इसी संघर्ष कड़ी में हम अत्यंत गर्व के साथ एक अवतारी दिव्यआत्मा का नाम जोड़ना चाहेगें जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वसम्मानीय शख्सियत लोकहृदयरत्न, ब्राह्मणकुलभूषण, कर्मठ महामनीषी, सौहार्दशिरोमणि धराधाम प्रमुख ‘गुरूदेव’  डॉ.सौरभ पाण्डेय जी का।जी हां, आदरणीय डॉ. सौरभ जी , देश के सबसे अद्भुत आध्यात्मिक और मानवीयता के प्रतीक धराधाम संगठन के संस्थापक के रूप में बेहद चर्चित शख्सियत हैं।
बता दें कि इस सौहार्दस्नेही दिव्यविभूति डॉ.सौरभ पाण्डेय जी ने वर्ष-2000 से दो निरक्षरों को साक्षर बनाने की शर्त पर अक्षर ज्ञान तथा सरकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए बिना किसी आर्थिक सहयोग से सैकड़ों गाँवों में चौपाल लगाई और 2008 में 100 दिवसीय तटबंध यात्रा जिसमें 427 गावों में सर्वधर्म सम्भाव हेतु चौपाल व मंदिर,मस्जिद गुरुद्वारा गिरिजाघर आदि धर्म स्थलों पर जनजागरूकताहेतु जागरण कार्यक्रम किया। तथा इसके अतिरिक्त हजारों नौनिहालों को  निशुल्क कंप्यूटर शिक्षा से जोड़ा तथा पर्यावरण के प्रति जागरूक करने हेतु स्वयं अपनी सुन्दर और सुशील धर्मपत्नी रागिनी जी के साथ पौधरोपण एवं हरयाली शादी करने का निरन्तर संदेश जन – जन तक पहुचाने के संदेश में अनवरत लगे हुए हैं।
सच ही है कि इस पवित्र, पाकीज़ा संगठन की एकता, विराटता और व्यापकता, विश्वसनीयता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि परम आदरणीय सौरभ जी व लाखों लोगों के प्रेम और आशीर्वाद से सिंचित यह संस्था आज विश्व के 132 देशों में कार्यरत है और निस्वार्थ सामाजिक विकास के कार्यक्रम संचालित कर पूरे विश्व में पीस एण्ड हैपीनेस, धार्मिक सौहार्द के नये कीर्तिमान गढ़ कर अपने महान अखंड भारत की विराट बसुधेव कुटम्बकम् वाली संस्कृति का वैश्विक स्तर पर परचम लहराने में सशक्त भूमिका निभा रही है । आज सौहार्द शिरोमणि डॉ.सौरभ पांडेय जी के समाज को एकसूत्र में बांधने के अभूतपूर्व, अद्भुत, अकल्पनीय कार्य कलाप, किसी तारीख और तारीफ़ और परिचय के मौहताज़ नही है।
आज के इन नवयुगनिर्माता और बेमिशाल सच्ची शख्सियत का  गोरखपुर जनपद के भस्मा में विद्वान महात्मास्वरूप श्री सोमनाथ पाण्डेय जी एवम विदुषि  ममतामयी माता स्व.गीता देवी जी के पुत्र के रूप  में हुआ था। इन्होंने अपनी पढ़ाई  पूर्ण करने के बाद, पत्रकारिता जगत से फिल्मों की दुनिया में दस्तक देते हुए और उस लाईमलाईट की चकाचौंध से बाहर आकर वे सेवा के कार्यों से जुड़ते चले गये। एक दिन उन्होंने महसूस किया कि क्या भगवान ने हमें सिर्फ धनार्जन के लिये ही यह अनमोल जीवन दिया है? या फिर लोगों को उनके अधिकारों-लक्ष्यों, प्रेम, सौहार्द, मानवता के प्रति अलख जगाने के लिये उनका जन्म हुआ है? बस उनको जवाब मिल चुका था। अब वह लोगों के हृदयतल पर अपनी सुकूनभरी ‘लोकजुड़ाव मंत्र’ की दस्तक देने को निकल पड़े। 
       लम्बे संघर्षोंपरांत वर्तमान में बुलंद समाजसेवी छवि के साथ ही आज वह ग्लोबल सेलेब्रिटी के रूप में सम्मान प्राप्त हैं, हलांकि वह खुद को सेलेब्रिटी नहीं मानते। उनका विचार है कि ”मैं राजा बनना नही चाहता बल्कि उत्कृष्ट मानवताहृदयी सेवक  बनाना चाहता हूँ।” मैं सफल व्यक्ति नहीं बल्कि गरिमामय व्यक्ति बनने का प्रयास कर रहा हूँ ।” 
आइये! जानते सौहार्द शिरोमणि डॉ.सौरभ पाण्डेय जी को उन्हीं की जुबानी-
सवाल 1- आपका पूरा नाम और आप मूलतः किस शहर के रहने वाले हैं? 
जवाब- ग्राम भस्मा जनपद गोरखपुर उत्तर प्रदेश भारत
सवाल 2- आपकी शिक्षा दीक्षा के बारे में बतायें? 
जवाब – दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर से स्नातकोत्तर, पत्रकारिता में स्नातक ,परास्नातक -व्यवसाय प्रसाशन, बी,सी,ए एम डी (इ यच)डी .लिट्
सवाल 3- आपके जीवन संघर्ष के बारे में बतायें? 
जवाब – मैं एक बहुत छोटे से किसान परिवार में जन्मा हुआ हूं।चार भाइयों में सबसे बड़ा व किसान पिता के साथ खेती बाड़ी के कामो में हाथ बंटा कर एक ही साथ सीमित साधनों से बमुश्किल अकादमी शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने क्षेत्र व आस – पास के लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने का संकल्प किया।इस क्रम में उन्होंने वर्ष 2000 निरक्षरों को साक्षर बनाने एवं वर्ष 2008 में  100 दिवसीय तटबंध यात्रा के माध्यम से गांव – गांव जाकर शिक्षा प्राप्त करने एवं बाढ़ से बचाव के लिए जागरूक किया।कमजोर व असहाय लोगों को स्वयं के प्रबंधन विद्यालय व कोचिंग संस्थान में प्रवेश करा कर शिक्षित व संस्कारित कर विधि के क्षेत्रों में सेवायोजन हेतु प्रेरित किया।इस दुरूह कार्यों में आढ़े आ रहे, धन की कमी पूरा करने के लिए जन सामान्य से सहयोग आमंत्रित कर न्यूनतम आंशिक वित्तीय सहयोग प्राप्त कर इस ज्ञान यज्ञ को निर्विघ्न सम्पन्न करता रहा।
सवाल4- आपके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा कौन है? 
जवाब – मेरे जीवन की प्रेरणा तो इस प्रकृति का प्रत्येक चराचर है।प्रकृति की एक-एक रचना ने मुझे व मेरी टीम के समर्पित साथियों को ऊर्जित व अनुशासित व निस्वार्थता ‘देने’ की भावना का हृदय में संचार किया है फिर भी हमारी महान माता स्व. गीता देवी व महान पिता श्री सोमनाथ पाण्डेय जी ,मित्र श्री रत्नाकर त्रिपाठी गुरु डॉ रत्नेश कुमार पाण्डेय, श्री गोरखलाल श्रीवास्तव राष्ट्रपति पदक सम्मानित शिक्षा विद ,मार्गदर्शक सूर्यप्रकाश पाण्डेय ,प्रेमप्रकाश एवं श्री प्रदीप टेकड़ीवाल व्यवसायी, डॉ एहसान अहमद और मेरी धर्म पत्नी रागिनी पाण्डेय,स्व,जगदीश प्रसाद शर्मा देवदूत आदि प्रेरणा स्तम्भ रहे हैं।
सवाल5- आपका धराधाम जैसी सौहार्द पूर्ण संस्था बनाने का ख्याल कब आया? तथा धराधाम बनाने का कोई खास कारण ?
जवाब – वर्तमान परिवेश में जब मैं कुछ सोचने और समझने के योग्य हुआ तो मैंने देखा कि धार्मिक कट्टरता के नाम पर मानव से मानव के बीच खाई खोदने का  अनरगल षड्यंत्र किया जा रहा है।लोग धार्मिक उन्माद में एक दूसरे की जान लेने पर भी उत्सव मना रहे हैं । एक दूसरे के धर्म स्थलों को तहस – नहस किया जा रहा है। इस भयावह एवं कारुणिक दृश्य को देखकर मन में भाव उत्पन्न हुआ कि एक ऐसी परिकल्पना को साकार किया जाये जहाँ मजहबी कट्टरता का कोई नाम – ओ- निशान ना हो। समस्त मानव जाति एक दूसरे का सम्मान करते हुए सभी के धार्मिक ग्रन्थों एवं धर्म स्थलों का सम्मान करे। इसके लिए आवश्यक है कि सभी धर्मों के पूजा स्थल एवं धार्मिक प्रतीकों को एक परिसर में स्थापित किया जाय जहाँ बिना भेद भाव के लोग अपनी आस्था का पालन करते हुए दूसरों का आदर करें ।इसी मनोभावों का परिणित स्वरूप आप सबका अपना ‘धराधाम’ है।
सवाल6- कितने वर्ष हुए सामाजिक गतिविधियों में और खुद को इस अभियान में कितना सफल पाते
हैं ?
जवाब- लगभग 20 वर्षों से सामाजिक कुरीतियों और पर्यावरण संरक्षण, अशिक्षा, आमी नदी पुनरुद्धार, बाल मजदूरी के लिए सतत संघर्ष करते हुए लोगों को जागरूक करता रहा। अकेला चला था और कारवां बनता गया। आज धराधाम की परिकल्पना धरातल पर अपना आकार ग्रहण कर रही है,यही इस अभियान की सफलता का परिणाम है ।
सवाल7- धराधाम इंटरनेशनल का मुख्य उद्देश्य क्या 
है ?
जवाब-समाज में उत्पन्न कुरीतियों के उन्मूलन हेतु प्रयास और सर्वधम सम्भाव। 
सवाल8- आपकी भविष्य में धराधाम  के द्वारा लोकहित में  क्या योजनायें हैं? अभी तक आपको और धराधाम संस्था को देश-विदेश से कितने सम्मान हासिल हो चुके हैं?
उतर- सबसे बड़ी योजना तो हम सबका लोककल्याण का सपना पूर्ण हो इसी दिशा में निरन्तर समाजोपयोगी कार्य होते रहें। हाँ, देश- विदेश से काफी सम्मान मिले हैं।जिनका नाम न लू तो बेहतर होगा क्योंकि हमें तो जन – जन  सम्मान देते हैं।कोई साज से कोई आवाज़ से कोई कोई भाव से कोई प्रभाव से ,कोई हार से कोई गीत से कोई संगीत से ।किस – किस सम्मान का नाम लू़ं। सभी के स्नेहरूपी आशीर्वाद से आत्मा पोर-पोर तृप्त है। 
सवाल9- धराधाम का सपना पूरे होने बाद क्या आपका कोई दूसरा सपना भी है? 
जवाब – धराधाम का सपना अपने आप मे पूर्ण सपना है और साक्षात् हकीकत भी। 
सवाल10 – आज पूरी दुनिया में कोरोना की वजह से बहुत बड़े स्तर पर बेरोजगारी फैली हुई है। क्या आपकी धराधाम संस्था बेरोजगारी के दंश को कुछ हद तक दूर करने में सहायक होगी? 
जवाब-विभिन्न माध्यमों से लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए सरकार द्वारा जारी दिशा – निर्देशों का पालन करते हुए उन्हें स्वरोजगार हेतु प्रेरित, मार्गदर्शित और आत्मनिर्भर बनाने का कार्य धराधाम इंटरनेशनल करने को कृतसंकल्पित है। 
सवाल11- पूरी दुनिया में धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक हिंसा चरम पर है आप धराधाम प्रमुख होने के नाते इस वैश्विक बुराई का आधार किसे मानते हैं और आप दुनिया को इस बुराई से निपटने का कौन सा सॉल्यूशन देना चाहेगें? 
जवाब – कुछ अलगाववादी ताकतों से हमें दूर रहना होगा।हमें समझना होगा कि जब  सृजन का एक ही तरीका है तो हम अलग कैसे? जब आने और जाने का सबका एक ही मार्ग है तो विभेद कैसा।हमें निज धर्म को मानते हुए अन्य धर्मों का भी सम्मान करें तो विवाद मुक्त समाज की संरचना होगी।
सवाल 12- आप खुद को एक लाइन में किस तरह परिभाषित करेगें?
उत्तर-कोई चलता है पदचिन्हों पर और कोई पदचिन्ह बनाता है। इसी पंक्ति को आत्मसात कर सभी को लेकर आगें बढ़ रहा हूं। सर्वशक्तिमान की कृपा से अपार जनसहयोग एवं शुभाशीष प्राप्त हो रहा है। इसी लिए प्रतीत होता है कि लोग हमें भीड़ से अलग व्यक्ति मानते हैं।
13-आप जो यह विशेष पीले रंग का परिधान और टोपी पहनते हैं आखिर! इसको ही आपने अपनी यूनीफार्म के रूप में क्यों चुना? 
जवाब – सूर्य का तेज भी पीला है। यह रंग सकारात्मक ऊर्जा पैदा करता है। इससे पाचन तंत्र, रक्त संचार और आंखें प्रभावित होती हैं। इस रंग के अंदर मन को बदलने की क्षमता होती है और यह जीवन में शुभता का प्रतीक है। इस परिधान का संदेश अनेकता में एकता का ऊर्जावान संदेश जन – जन तक पहुंचना है और आपको इस ड्रैस में बैच के रूप में सभी धर्मों की सम्मानित झलक दिखेगी। आइये! आप सब का धराधाम में स्वागत है।
           कवरेज- ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना
              न्यूज ऐडीटर सच की दस्तक
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