जानिए! भगवान सियाराम के पुत्र लव-कुश का अतिप्राचीन इतिहास

भगवान श्री राम और माता सीता के दो प्यारे महावीर महापराक्रमी पुत्र जिन्होंने भगवान हनुमानजी तक तो पेड़ से बाध लिया था, हाँ हनुमान जी जान चुके थे। उन्होंने भगवान श्री राम की सेना को यहां तक की लक्ष्मण जी तक को परास्त कर दिया था। हम आपको उनका महान इतिहास बताने की कोशिश करते हैं.. हमसे भी गल्ती हो सकती है… क्योंकि भगवान श्री राम विराट हैं और विराट है उनके पुत्र व वंशज

लव और कुश : भरत के दो पुत्र थे- तार्क्ष और पुष्कर। लक्ष्मण के पुत्र- चित्रांगद और चन्द्रकेतु और शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु और शूरसेन थे। मथुरा का नाम पहले शूरसेन था। लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया।

राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोसल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था।

माना जाता है लव के पुत्र सरूक्मान थे। 

कुश ने नागकन्या कुमुदावती से विवाह किया और अथिथि के पिता बने। एक अन्य जानकारी के अनुसार, लव-कुश के 50वीं पीढ़ी में शल्य का जन्म हुआ, जो महाभारत काल में कौरवों की तरफ से युद्ध में शामिल हुए थे।

राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बर्गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने लवपुरी नगर की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं।

राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा तो कुश से अतिथि और अतिथि से, निषधन से, नभ से, पुण्डरीक से, क्षेमन्धवा से, देवानीक से, अहीनक से, रुरु से, पारियात्र से, दल से, छल से, उक्थ से, वज्रनाभ से, गण से, व्युषिताश्व से, विश्वसह से, हिरण्यनाभ से, पुष्य से, ध्रुवसंधि से, सुदर्शन से, अग्रिवर्ण से, पद्मवर्ण से, शीघ्र से, मरु से, प्रयुश्रुत से, उदावसु से, नंदिवर्धन से, सकेतु से, देवरात से, बृहदुक्थ से, महावीर्य से, सुधृति से, धृष्टकेतु से, हर्यव से, मरु से, प्रतीन्धक से, कुतिरथ से, देवमीढ़ से, विबुध से, महाधृति से, कीर्तिरात से, महारोमा से, स्वर्णरोमा से और ह्रस्वरोमा से सीरध्वज का जन्म हुआ।

कुश वंश के राजा सीरध्वज को सीता नाम की एक पुत्री हुई। सूर्यवंश इसके आगे भी बढ़ा जिसमें कृति नामक राजा का पुत्र जनक हुआ जिसने योग मार्ग का रास्ता अपनाया था। कुश वंश से ही कुशवाह, मौर्य, सैनी, शाक्य संप्रदाय की स्थापना मानी जाती है।

एक शोधानुसार लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। यह इसकी गणना की जाए तो लव और कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे। इसके अलावा शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अन्तरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन, सिद्धार्थ, राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए।

कुछ अन्य इतिहासकारों के मुताबिक – 

जहां लव या लोह ने एक नए राज्य की स्थामना की जो कहीं उत्तर पूर्व पंजाब में है (कुछ लोग लाहौर को भी इससे जोड़ते हैं.) वहीं कुश ने कोसला राज्य (जिसे अयोध्या से बनाया गया था.) में राज किया।कुश राम जितने पराक्रमी राजा नहीं थे और असुर दुर्जया से युद्ध में ही उन्होंने मृत्यु प्राप्त की थी।

कुश के बाद राज्य उनके और नाग कन्या कुमुदवती के पुत्र अतिथी के हाथों में चला गया जो एक शूरवीर थे। उनके बाद उनके पुत्र निशध ने राज्य को संभाला. उसके बाद नल जो निशध के पुत्र थे वो राजा बने. नल के बाद नभ ने ये जिम्मा संभाला. तब तक राज्य उत्तर कौशल बन चुका था. नभ के बाद पुण्डरीक, फिर शेमधानव, देवानीक, अहीनागू, परियात्रा, शिल, नाभी, शिखंड, हरिद्शवा, विशवासा, हिरान्याभा, कौसल्य, ब्रह्महिस्था, पुत्रा, पुष्य, और उसके बाद ध्रुवासंधी ने राज्य संभाला. तब तक राज्य काफी बदल चुका था. ध्रुवासंधी की अकाल मृत्यु के बाद 6 साल का बेटा सुदर्षन गद्दी पर बैठा, उसके बाद अग्निवर्णा दूसरी पीढ़ी का राजा बना. अग्निवर्णा ही वो राजा था जिसके कारण रघुवंश का खात्मा हुआ. अग्निवर्णा हमेशा महिलाओं में व्यस्थ रहता था. अग्निवर्णा बहुत कमजोर राजा था, लेकिन कोई भी अन्य राजा रघुवंशियों से भिड़ना नहीं चाहता था इसीलिए राज्य पर आक्रमण नहीं किया. उसकी मृत्यु बहुत जल्दी हो गई और तब उसकी पत्नी गर्भवती थी. इसी के साथ रघुकुल का अंत हुआ था.

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यहां हुआ लव-कुश का जन्म – 

मेरठ के पास स्थित बागपत का नाम तो सभी ने सुना होगा। वहां एक बहुत ही प्रसिद्घ मंदिर है, पुरा महादेव। कांवड़ के समय वहां पर लाखों श्रद्घालु गंगाजल लाकर भोले शंकर का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि बागपत में ही एक जगह एेसी भी है, जहां भगवान राम और माता सीता के बेटे लव व कुश का जन्म हुआ था।

लवकुश के चरणों के प्राचीन चिन्ह

मेरठ से करीब 27 किलोमीटर दूर बागपत का एक गांव है बलैनी। यह गांव बागपत शहर से भी करीब 23 किलोमीटर दूर है। मेरठ से बागपत की तरफ जाते समय करीब 27 किलोमीटर दूर अंदर की तरफ एक रास्ता कटता है। इस रास्ते पर आप चलेंगे तो आखिर में आपको एक आश्रम दिखाई देगा।

बलैनी का पंचमुुखी लव-कुश कालीन शिव मंदिर

यह है वाल्मीकि आश्रम।वाल्मीकि ने ही रामायण ग्रंथ की रचना की थी। माना जाता है कि यह उन्हीें का आश्रम है। इसी आश्रम में सीता जी आकर रही थी और यहीं पर लव और कुश का जन्म हुआ था।

इस आश्रम को पहले ब्रह्मतुंग नाम से भी जाना जाता है – 

वह बताते हैं कि इस आश्रम को पहले ब्रह्मतुंग नाम से जाना जाता था। बाद में इसे नागेश्वर महादेव के नाम से पहचान मिली। वहीं, बाल्मीकि आश्रम के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान अब बालैनी कहा जाने लगा है। हर साल आखातीज यानि अक्षय तृतीया के अवसर पर यहां लव-कुश का जन्मदिवस मनाया जाता है।

कुछ इतिहासकार बिठूर को मानते है लव-कुश का जन्मस्थान –

कानपुर शहर से 17 किलोमीटर दूर बिठूर में बने महर्षि वाल्मीकि आश्रम की।  लव-कुश की जन्म स्थली कही जाने वाले बिठूर में हर दिन हजारों की संख्या में लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं। केवल शहर के ही नहीं, बल्कि कानपुर आने वाले सैलानी भी भगवान राम से जुड़ी इस स्थली के मोह से दूर नहीं हो पाते हैं। सीता रसोई, वाल्मीकि आश्रम आदि के अस्तित्व आज भी यहां विराजमान हैं। यहां माता सीता का एक मंदिर भी है। मंदिर में माता सीता की प्रतिमा अपने पुत्र लव और कुश के साथ है।

मंदिर के पुजारी के मुताबिक आठ लाख साल पहले माता सीता बिठूर आईं थी और यहीं पर लव-कुश का जन्म हुआ था। लव-कुश ने इसी स्थान पर वाल्मीकि से शिक्षा भी प्राप्त की थी। वहीं राम जानकी मन्दिर में लव कुश के बाण आज भी रखे हुए हैं। गंगा नदी के किनारे बसे इस स्थान पर एक ओर सीता रसोई भी बनी हुई है। यहीं पर सीता जी भोजन बनाती थीं। उस समय उपयोग किए गए बर्तन भी सीता रसोई में मौजूद हैं। पुजारी ने बताया कि लव-कुश यहीं पर मां गंगा में स्नान करते थे और यहीं पर बाण चलाना, घुड़सवारी आदि भी सीखी थी।

यहीं पकड़ा गया था अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा

भगवान राम ने जब अश्वमेघ यज्ञ कराया था, तो कोई भी राजा उस समय उनके घोड़े को पकड़ने की हिम्मत नहीं कर पाया था। वाल्मीकि रामायण में उल्लेख है कि जब वह घोडा बिठूर पहुंचा तो लव-कुश ने उसे बांध लिया था। इसके बाद राम भक्त हनुमान यहां घोड़ा छुडाने के लिए आये थे। लव-कुश से युद्ध में वह परास्त हो गए और उन्हें यहीं पर बंधक बना लिया गया था। आज भी यहां पर वह स्थल बना हुआ है, जहां पर हनुमान जी को कैद किया गया था। इसके बाद घोड़ा छुड़ाने पहुंचे लक्ष्मण जी को भी यहीं पर बंधक बना लिया गया था।

बताया जाता है कि यहीं पर सीता जी पाताल में समाई थीं। हनुमान और लक्ष्मण की कोई खबर न मिलने पर भगवान राम स्वयं युद्ध के लिए यहां पहुंचे थे। युद्ध के बीच में ही उन्हें पता चला था कि जिन लव-कुश से वे युद्ध कर रहे हैं, वे उनके ही पुत्र हैं। इसके बाद माता सीता से राम की मुलाकात भी यहीं पर हुई थी। जब राम ने माता सीता को स्पर्श करने की कोशिश की तो वे धरती में समा गईं। यह स्थान भी यहां मौजूद हैं। सुबह शाम इस स्थल पर पूजा की जाती है।

लव-कुश के वंशज –

लव और कुश के कुल के लोग जो भारत में आज भी निवास करते हैं।

– ब्रह्मा के कई पुत्र थे जिनमें से 10 प्रमुख हैं- मरीचि, अंगिरस्, अत्रि, भृगु, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्सय, ऋतु, दक्ष, स्वायंभुव मनु।

– मरीचि की पत्नि दक्ष- कन्या संभूति थी। इनकी दो और पत्निनयां थी- कला और उर्णा। कला से उन्हें कश्यप नामक एक पुत्र मिला। इन्होंने दक्ष की 13 पुत्रियों से विवाह किया था।
– कश्यप पत्नी अदिति से देवता और दिति से दैत्यों की उत्पत्ति हुई। अदिति के 10 पुत्र थे, विवस्वान्, इंद्र, धाता, भग, पूषा, मित्र, अर्यमा, त्वष्टा, अंशु, वरुण, सविता। कहीं कहीं पर यह नाम इस तरह पाए जाते हैं- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)।

– कश्यप के बड़े पुत्र विवस्वान् से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे।

वैवस्वत मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुँची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी। (पुत्री इला का विवाह बुध से हुआ जिसका पुत्र पुरुरवा चंद्रवंशी था)।

– रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है:- ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान् और विवस्वान् के वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।

– इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए और मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए।

– भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए। सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे। सगर के पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतार था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।

– रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं। वा‍ल्मीकि रामायण- ॥1-59 से 72।।

संपूर्ण देश में भगवान श्री राम के वंशजों अनेक हैं जिसकी संपूर्ण वंशावली को यहां देना असंभव है।

कुश की एक यह वंशावली‍ मिलती है:-

राम के जुड़वा पुत्र लव और कुश हुए। कुश के अतिथि हुए, अतिधि के निषध हुए, निषध के नल हुए, नल के नभस, नभस के पुण्डरीक, पुण्डरीक के क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वा के देवानीक, देवानीक के अहीनगर, अहीनर के रुरु, रुरु के पारियात्र, पारियात्रा के दल, दल के छल (शल), शल के उक्थ, उक्थ के वज्रनाभ, वज्रनाभ के शंखनाभ, शंखनाभ के व्यथिताश्व, व्यथिताश्व से विश्‍वसह, विश्वसह से हिरण्यनाभ, हिरण्यनाभ से पुष्य, पुष्य से ध्रुवसन्धि, ध्रुवसन्धि से सुदर्शन, सुदर्शन से अग्निवर्णा, अग्निवर्णा से शीघ्र, शीघ्र से मुरु, मरु से प्रसुश्रुत, प्रसुश्रुत से सुगवि, सुगवि से अमर्ष, अमर्ष से महास्वन, महास्वन से बृहदबल, बृहदबल से बृहत्क्षण (अभिमन्यु द्वारा मारा गया था), वृहत्क्षण से गुरुक्षेप, गुरक्षेप से वत्स, वत्स से वत्सव्यूह, वत्सव्यूह से प्रतिव्योम, प्रतिव्योम से दिवाकर, दिवाकर से सहदेव, सहदेव से बृहदश्‍व, वृहदश्‍व से भानुरथ, भानुरथ से सुप्रतीक, सुप्रतीक से मरुदेव, मरुदेव से सुनक्षत्र, सुनक्षत्र से किन्नर, किन्नर से अंतरिक्ष, अंतरिक्ष से सुवर्ण, सुवर्ण से अमित्रजित्, अमित्रजित् से वृहद्राज, वृहद्राज से धर्मी, धर्मी से कृतन्जय, कृतन्जय से रणन्जय, रणन्जय से संजय, संजय से शुद्धोदन, शुद्धोदन से शाक्य, शाक्य (गौतम बुद्ध) से राहुल, राहुल से प्रसेनजित, प्रसेनजित् से क्षुद्रक, क्षुद्रक से कुंडक, कुंडक से सुरथ, सुरथ से सुमित्र, सुमित्र के भाई कुरुम से कुरुम से कच्छ, कच्छ से बुधसेन।

बुधसेन से क्रमश: धर्मसेन, भजसेन, लोकसेन, लक्ष्मीसेन, रजसेन, रविसेन, करमसेन, कीर्तिसेन, महासेन, धर्मसेन, अमरसेन, अजसेन, अमृतसेन, इंद्रसेन, रजसेन, बिजयमई, स्योमई, देवमई, रिधिमई, रेवमई, सिद्धिमई, त्रिशंकुमई, श्याममई, महीमई, धर्ममई, कर्ममई, राममई, सूरतमई, शीशमई, सुरमई, शंकरमई, किशनमई, जसमई, गोतम, नल, ढोली, लछमनराम, राजाभाण, वजधाम (वज्रदानम), मधुब्रह्म, मंगलराम, क्रिमराम, मूलदेव, अनंगपाल, श्रीपाल (सूर्यपाल), सावन्तपाल, भीमपाल, गंगपाल, महंतपाल, महेंद्रपाल, राजपाल, पद्मपाल, आनन्दपाल, वंशपाल, विजयपाल, कामपाल, दीर्घपाल (ब्रह्मापल), विशनपाल, धुंधपाल, किशनपाल, निहंगपाल, भीमपाल, अजयपाल, स्वपाल (अश्‍वपाल), श्यामपाल, अंगपाल, पुहूपपाल, वसन्तपाल, हस्तिपाल, कामपाल, चंद्रपाल, गोविन्दपाल, उदयपाल, चंगपाल, रंगपाल, पुष्पपाल, हरिपाल, अमरपाल, छत्रपाल, महीपाल, धोरपाल, मुंगवपाल, पद्मपाल, रुद्रपाल, विशनपाल, विनयपाल, अच्छपाल (अक्षयपाल), भैंरूपाल, सहजपा,, देवपाल, ‍त्रिलोचनपाल (बिलोचनपाल), विरोचनपाल, रसिकपाल, श्रीपाल (सरसपाल), सुरतपाल, सगुणपाल, अतिपाल, गजपाल (जनपाल), जोगेद्रपाल, भौजपाल (मजुपाल), रतनपाल, श्यामपा,, हरिचंदपाल, किशनपाल, बीरचन्दपाल, तिलोकपाल, धनपाल, मुनिकपाल, नखपाल (नयपाल), प्रतापपाल, धर्मपाल, भूपाल, देशपाल (पृथ्वीपाल), परमपाल, इंद्रपाल, गिरिपाल, रेवन्तपाल, मेहपाल (महिपाल), करणपाल, सुरंगपाल (श्रंगपाल), उग्रपाल, स्योपाल (शिवपाल), मानपाल, परशुपाल (विष्णुपाल), विरचिपाल (रतनपाल), गुणपाल, किशोरपाल (बुद्धपाल), सुरपाल, गंभीरपाल, तेजपाल, सिद्धिपाल (सिंहपाल), गुणपाल, ज्ञानपाल (तक गढ़ ग्यारियर राज किया), काहिनदेव, देवानीक, इसैसिंह (तक बांस बरेली में राज फिर ढूंढाड़ में आए), सोढ़देव, दूलहराय, काकिल, हणू (आमेर के टीकै बैठ्या), जान्हड़देव, पंजबन, मलेसी, बीजलदेव, राजदेव, कील्हणदेव, कुंतल, जीणसी (बाद में जोड़े गए), उदयकरण, नरसिंह, वणबीर, उद्धरण, चंद्रसेन, पृथ्‍वीराज सिंह (इस बीच पूणमल, भीम, आसकरण और राजसिंह भी गद्दी पर बैठे), भारमल, भगवन्तदास, मानसिंह, जगतसिंह (कंवर), महासिंह (आमेर में राजा नहीं हुए), भावसिंह गद्दी पर बैठे, महासिंह (मिर्जा राजा), रामसिंह प्रथम, किशनसिंह (कंवर, राजा नहीं हुए), कुंअर, विशनसिंह, सवाई जयसिंह, सवाई ईश्वरसिंह, सवाई मोधोसिंह, सवाई पृथ्‍वीसिंह, सवाई प्रतापसिंह, सवाई जगतसिंह, सवाई जयसिंह, सवाई जयसिंह तृतीय, सवाई रामसिंह द्वितीय, सवाई माधोसिंह द्वितीय, सवाई मानसिंह द्वितीय, सवाई भवानी सिंह (वर्तमान में गद्दी पर विराजमान हैं)

अन्य तथ्य:

राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बर्गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला।

राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा तो कुश से अतिथि और अतिथि से, निषधन से, नभ से, पुण्डरीक से, क्षेमन्धवा से, देवानीक से, अहीनक से, रुरु से, पारियात्र से, दल से, छल से, उक्थ से, वज्रनाभ से, गण से, व्युषिताश्व से, विश्वसह से, हिरण्यनाभ से, पुष्य से, ध्रुवसंधि से, सुदर्शन से, अग्रिवर्ण से, पद्मवर्ण से, शीघ्र से, मरु से, प्रयुश्रुत से, उदावसु से, नंदिवर्धन से, सकेतु से, देवरात से, बृहदुक्थ से, महावीर्य से, सुधृति से, धृष्टकेतु से, हर्यव से, मरु से, प्रतीन्धक से, कुतिरथ से, देवमीढ़ से, विबुध से, महाधृति से, कीर्तिरात से, महारोमा से, स्वर्णरोमा से और ह्रस्वरोमा से सीरध्वज का जन्म हुआ।

कुश वंश के राजा सीरध्वज को सीता नाम की एक पुत्री हुई। सूर्यवंश इसके आगे भी बढ़ा जिसमें कृति नामक राजा का पुत्र जनक हुआ जिसने योग मार्ग का रास्ता अपनाया था। कुश वंश से ही कुशवाह, मौर्य, सैनी, शाक्य संप्रदाय की स्थापना मानी जाती है। एक शोधानुसार लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, ‍जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। यह इसकी गणना की जाए तो लव और कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 6,500 से 7,000 वर्ष पूर्व।

इसके अलावा शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अन्तरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन, सिद्धार्थ, राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। माना जाता है कि जो लोग खुद को शाक्यवंशी कहते हैं वे भी श्रीराम के वंशज हैं।

तो यह सिद्ध हुआ कि वर्तमान में जो सिसोदिया, कुशवाह (कछवाह), मौर्य, शाक्य, बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) आदि जो राजपूत वंश हैं वे सभी भगवान प्रभु श्रीराम के वंशज है। जयपूर राजघराने की महारानी पद्मिनी और उनके परिवार के लोग की राम के पुत्र कुश के वंशज है। महारानी पद्मिनी ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए में कहा था कि उनके पति भवानी सिंह कुश के 309वें वंशज थे।

इस घराने के इतिहास की बात करें तो 21 अगस्त 1921 को जन्में महाराज मानसिंह ने तीन शादियां की थी। मानसिंह की पहली पत्नी मरुधर कंवर, दूसरी पत्नी का नाम किशोर कंवर था और माननसिंह ने तीसरी शादी गायत्री देवी से की थी। महाराजा मानसिंह और उनकी पहली पत्नी से जन्में पुत्र का नाम भवानी सिंह था। भवानी सिंह का विवाह राजकुमारी पद्मिनी से हुआ। लेकिन दोनों का कोई बेटा नहीं है एक बेटी है जिसका नाम दीया है और जिसका विवाह नरेंद्र सिंह के साथ हुआ है। दीया के बड़े बेटे का नाम पद्मनाभ सिंह और छोटे बेटे का नाम लक्ष्यराज सिंह है।

धार्मिक स्थल तुरतुरिया का भी है पौराणिक महत्व – इसे भी लवकुश जन्मस्थान मानते हैं-

 

खुदाई में मिले लव-कुश कालीन मंदिर

 

भगवान गणेशजी लवकुश प्राचीन की प्रतिमा

गौमुख तुरतुरिया

रामायण धार्मिक स्थल तुरतुरिया महर्षि वाल्मिकी की महान धरा एवं माता सीता के पुत्र लव-कुश का जन्मस्थल कहे जाने वाला धार्मिक स्थल तुरतुरिया आज बदहाली का दंश झेलने के लिए विवश है। इस तीर्थस्थल को विकसित करने के लिए शासन द्वारा किसी तरह के प्रयास नहीं किए जा रहे। गौरतलब है कि यहाँ हर साल छेरछेरा पुन्नी के पावन पर्व पर तीन दिवसीय भव्य मेला का आयोजन किया जाता है जिसमें हजारों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।

सनातन धर्म से जुड़ी धरती :

सनातन धर्म की आस्था इस धरती से जुड़ी है रामायण कालीन महर्षि वाल्मिकी आश्रम एवं वैदेही विहार के रूप में माता सीता तथा लव-कुश की यादों को सहेजे यह धरती शांत मन को प्रफुल्लित करने वाली है। यहां शक्तिस्वरूपा मां काली की प्रतिमा सघन वृक्षों एवं पहाड़ों में विराजित है, जहां क्षेत्रवासी अपनी मुरादें पूरी करने प्रति वर्ष छेरछेरा पुन्नी मेले में आते हैं और इन्हें तुरतुरिया माता के नाम से पुकारते हैं।

जनपद पंचायत के अधीन देख-रेख : 

तुरतुरिया मेला की व्यवस्था स्थानीय जनपद पंचायत के अधीन है। बताया जाता है कि मेला के तीन दिन लाखों श्रद्घालुओं का रेलमपेल लगा रहता है लेकिन अभी वर्तमान समय में इस पावन भूमि के प्रति लोगों की आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ने के साथ-साथ बारहों महीने लोगों का आवागमन लगा रहता है।

कसडोल के जनपद पंचायत सीईओ प्रताप सिंह ठाकुर के अनुसार तुरतुरिया में तीन दिन का मेला लगता है जिसमें मेला समितियों के द्वारा व्यवस्था की जाती है लेकिन अब वर्षभर श्रद्घालु आते रहते हैं। इसके चलते जल्द ही श्रद्घालुओं को समुचित व्यवस्था प्रदान करने के लिए आगामी मेला समिति की बैठक में प्रस्ताव रखा जाएगा।

पुराना रास्ता ही था सुरक्षित : 

ग्राम ठाकुर दिया से तुरतुरिया पहुंचने के 4 किमी. मार्ग पर जान-लेवा घाटियों से होकर गुजरना पड़ता है। लोगों का कहना है कि तुरतुरिया जाने के लिए पुराना मार्ग ही सही था, लेकिन स्टाप डेम बनाने के कारण पुराने रास्ते को बंद कर दिया गया है। जिसके चलते श्रद्घालु इस जानलेवा ढलान वाली घाटी से अंजान रहते हैं जिसके कारण हमेशा दुर्घटना होने की आशंका बनी रहती है। स्थानीय लोगों की मांग है कि शासन यहां सुविधाएं बढ़ाए और उक्त घाटी की ढलान को कम करें ताकि गंभीर दुर्घटनाओं को टाला जा सके।

कैसे पहुचें- 
यह सिरपुर से मात्र 35 कि मी कि दूरि पर स्थित है।यह बलौदा बाजार जिले के लवन परिश्रेत्र के विकासखण्ड कसडोल मे आता है। रायपुर से इसकी दूरी लगभग 140 किमी के आस पास है।रास्ते सड़क है मगर आश्रम से 5  किमी के पहले रास्ते कच्चे हैं और काफी घुमावदार है।यदि तुरतुरिया आना है। तो सुबह आना उचित रहता है यहाँ रास्ते दुर्गम है। शाम के समय जंगलि जानवर निकलने का डर बना रहता है।यहा पर प्रतिवर्ष पौस पुन्नीमा को विषाल मेला लगता है। जिसमे भारी मात्रा मे जन सैलाब उमडता है। जो देखने लायक रहता है।

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