दिग्विजय सिंह की सियासत खत्म, शर्मनाक हार-

भोपाल।

कमलनाथ की चुनौती स्वीकार करके भोपाल सीट से चुनाव लड़ने आए दिग्विजय सिंह के लिए चुनाव परिणाम किसी सदमे से कम नहीं हो सकते। दिग्विजय सिंह के बारे में उपस्थित तमाम धारणाएं खत्म हो गईं, मान्यताएं बेनामी साबित हुईं, आत्मविश्वास इस कदर चकनाचूर हुआ कि शायद ही कभी जुड़ पाए। एक तरह से दिग्विजय सिंह की चुनावी राजनीति समाप्त हो गई।

कमलनाथ ने चुनौती देकर भोपाल बुलाया था
10 साल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह आज तक एक भी चुनाव नहीं हारे थे। वह अपनी परंपरागत सीट राजगढ़ से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन सीएम कमलनाथ ने ये कहकर उन्हें भोपाल की ओर भेज दिया कि पार्टी के बड़े नेताओं को कठिन सीट से चुनाव लड़ना चाहिए। दिग्विजय सिंह ने इस चैलेंज को स्वीकार किया और चुनाव अभियान पर निकल पड़े। वो मार्च महीने के आख़िरी दिन थे।

डेढ़ महीना दिन-रात एक किया, जिंदगी का सबसे ज्यादा परिश्रम किया

दिग्विजय सिंह ने डेढ़ महीना से कुछ ज़्यादा वक्त तक दिन-रात एक कर दिया। बेहद प्लानिंग के साथ चुनाव प्रचार का खाका तैयार किया गया। करीब आधा दर्जन समर्थक मंत्री और विधायक भोपाल में उनका प्रचार अभियान संभाले रहे। खुद मंत्री पुत्र जयवर्धन और विधायक भाई लक्ष्मण सिंह भी मैनेजमेंट देखते रहे। पूरे लोकसभा क्षेत्र की दिग्विजय सिंह ने पदयात्रा की। चिलचिलाती धूप और गर्मी में वह पैदल एक-एक इलाके में जनसंपर्क करने निकले।
सिर्फ मुस्लिम वोट मिले

भोपाल के दो विधानसभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल हैं। भोपाल मध्य और उत्तर। इन दोनों में तो कांग्रेस को लीड मिली लेकिन बाक़ी 6 में दिग्विजय सिंह पिछड़े रहे। इसकी कई वजह दिखती हैं।

भोपाल बीजेपी का गढ़ है। यहां लगातार 30 साल से ज्यादा वक़्त से बीजेपी का कब्ज़ा है। यहां प्रत्याशी नहीं सिर्फ पार्टी मायने रखती है।
कर्मचारियों ने माफ नहीं किया, बदला लिया
एक दूसरी बड़ी वजह सरकारी कर्मचारी भी हैं। दिग्विजय सिंह 10 साल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनका इस शहर और लोगों से लगातार जीवंत संपर्क तो बना रहा लेकिन कर्मचारी विरोधी उनके फैसलों को याद किया जाता रहा। हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने दो बार सरकारी कर्मचारियों से मुलाक़ात कर उनसे माफ़ी भी मांगी।

दिग्विजय सिंह ने अपने शासन में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की सेवा ख़त्म कर दी थी। उस वक्त करीब 40 हज़ार कर्मचारी उससे प्रभावित हुए थे। उस एक फैसले का असर उनके परिवार और कई पीढ़ी प्रभावित हुए थे वो पीढ़ी अब भी भोपाल में है। सरकारी कर्मचारियों का डीए और कई विभाग खत्म कर उन्हें मर्ज करने का फैसला भी दिग्विजय सिंह ने किया था। लगता है जनता ने अब उस पर अपना फैसला सुनाया।

भगवा में रंग गए लेकिन हिंदुओं ने अपना नहीं माना
अपने पूरे प्रचार के दौरान उन्होंने हिंदू-मुस्लिम-सिख ईसाई के नारे लगाए। साथ ही हिंदू मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए मंदिर-मंदिर जाकर हिंदुत्व होने का संदेश भी दिया। बार-बार नर्मदा हर का नारा लगाया। उनके समर्थन में साधु-संतों की फौज उतरी। कम्प्यूटर बाबा ने कमान संभाली लेकिन भगवा पहने साध्वी प्रज्ञा के सामने ये मैसेज मतदाता ने स्वीकार नहीं किया।

राष्ट्रवाद की आंधी में उड़ गया दिग्विजय सिंह का विजन डाक्यूमेंट
कांग्रेस की ओर से उनके पक्ष में कोई बड़ा नेता या प्रचारक नहीं आया। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी पूरे प्रदेश में घूमे लेकिन भोपाल नहीं आए। प्रियंका का रोड-शो भी मालवा में कराया गया लेकिन भोपाल से दूरी बनी रही। जबकि प्रज्ञा ठाकुर के पक्ष में खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने भोपाल में रोड-शो कर माहौल बनाया। दिग्विजय सिंह ने भोपाल के विकास के लिए विजन डॉक्यूमेंट जारी किया लेकिन हिंदुत्व, राष्ट्रवाद की आंधी में वो ठहर नहीं सका। बीजेपी का मज़बूत संगठन और सुनियोजित रणनीति उसकी रीढ़ है। कांग्रेस उसके आगे टिक नहीं पायी।

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