मशहूर लेखक डिम्पल सानन की कविता ”बेटी”

माना बेटे की चाह रखने वाले

लोग ज्यादा हैं पर

बेटी के जन्म की
खुशी मनाने में कोई बुराई न होगी

जो आज मैं लिख सकूं
बेटियों पर चंद शब्द सार्थक
तब भी भ्रूणहत्या की
कोई भरपाई न होगी…

 

 

यह भी मान लिया कि
बेटे घर का चिराग होते हैं,
पर मैंने तो कहीं नहीं पढ़ा,
बेटियाँ माँ-बाप की परछ़ाई नहीं होती..
प्रभु रामचंद्र सा बेटा कौन नहीं चाहता,
पर अगर सीता माता-सी बेटी
मानसहित घर लौट आई न होती,
तो दीवाली किसी ने मनाई न होती,
दीपक की कतारें यूँ सजाई न होती,
माँलक्ष्मी सबके घरों में यूँ आई न होती..!

क्या देखा है तुमने कभी ऐसे पिता को,
अपनी बेटी की विदाई पर आँख
जिसकी भर आई न होती,
अपनी फूल-सी बच्ची को विदा कर
पिता की आत्मा मुरझाई न होती….
या फिर मिले हो कभी ऐसी माँ से,
जिसने अपने हिस्से की मिठाई
अपनी परी को खिलाई न होगी,
और खुद के कंगन बेच-बेचकर
अपनी बेटी दुल्हन सी सजाई न होगी…..

अगर बेटों से ही होती घर की रौनक,
भगवान ने बेटी बनाई न होती,
अगर बेटी इस दुनिया में आई न होती,
तो यह कविता आज मैं लिख पाई न होती….!

 

___ डिम्पल सानन,
जिला प्रभारी सच की दस्तक, देहरादून

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