रिलीज़ हुई शार्ट फ़िल्म समाज

हम कैसा समाज चाहते हैं हम किस समाज में जी रहे हैं समाज का क्या प्रारूप होना चाहिये क्या बदलाव होने चाहिए  यही दर्शाती हुई कुछ दिन पहले रिलीज़ हुई शार्ट फ़िल्म समाज एक बहुत ही खूबसूरत सन्देश देती है, लिंगभेद  स्त्री पुरुष की शिक्षा और संस्कारों को लेकर भेदभाव दिव्यांगता के प्रति रूढ़िवादी सोच जैसी अनेक कुरीतियों पर प्रकाश डालती यह शार्ट फ़िल्म मशहूर लेखिका काव्य वर्षा द्वारा रचित है उनका सिर्फ एक साफ सुथरा संदेश जो कि फ़िल्म देखने वालों जो दिया गया है  कि दिव्यांगता को नहीं योग्यता को देखें। इसमें कुल 3 किरदार हैं दो बचपन के दोस्त बहुत दिन बाद आकर मिलते हैं सुधीर और केशव  , केशव  रूढ़िवादी सोच का शिकार है जिसने अपने बच्चों के सब कुछ किया परन्तु बदले में उसे सिर्फ अकेलापन मिला ,दूसरी तरफ सुधीर एक स्वतंत्र सोच का मालिक है जिसे समाज की बेकार बनाई कुरीतियों से कोई लेना देना नहीं है।
उसकी बच्ची दिव्यांग है परंतु उसने फिर भी अपनी बच्ची को सामान्य बच्चों से अधिक महत्व देते हुए खूब पढ़ाया लिखाया और अच्छे संस्कार दिए दोनों दोस्तों की अलग विचारधारा समाज के दो हिस्सों की व्यथा बयान करती है आशीष वशिष्ठ ( सुधीर) के किरदार में एक अलग तरह का जोश , सकारात्मकता एवं गर्व से भरे हुए पिता की झलक साफ नजर आती है , सुदेश सिंह परिहार ( केशव) अपने किरदार में पूरी तरह डूबे हुए नज़र आते हैं अपने एक एक संवाद के साथ न्याय करते हैं।
उन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता कि उनकी यह पहली शार्ट फ़िल्म है  विशाल सेन जो कि एक मेहमान कलाकार के रूप में दिखाई देते हैं अपने नेचुरल अभिनय की छाप छोड़ ही जातें हैं इससे यह सिद्ध होता है किरदार में जान डालने के लिए बहुत लंबा रोल नहीं कुछ सेकंड ही काफी होते हैं अब बात है निर्देशन की समाज को एक्लव्य  सेन ने एक बड़े ही सरल ढंग से दर्शकों तक पहुंचाया है उनके निर्देशन की यही एक खास बात है वो गोरिल्ला फ़िल्म टेक्निक का इस्तेमाल हमेशा करते हुए नज़र आते हैं जिसमें बनावटी चीज़ों का विश्लेषण न के बराबर ही होता है सिनेमाटोग्राफी की बात करें तो बड़े ही उम्दा तरीके से एक एक सीन को एक्लव्य ने फिल्माया है , एडिटिंग में कुछ चीज़ों को लम्बा खींचा ज़रूर गया है पर एक हद तक जायज़ है भी और नहीं भी , फ़िल्म कुल मिलाकर एक सीख देती है और रूढ़ीवादी सोच वालों के चेहरे पे एक खड़ा तमाचा है जो लड़कियों और दिव्यांग बच्चों को बोझ समझते हैं फ़िल्म का एक पहलू  एक कमी को दर्शाता है या शायद मांग करता है कि शायद अगर इसमें कुछ संवादों की जगह किरदारों का सहारा लिया जाता या थोड़ा और गहराई में उतारा जाता तो इसका रूप कुछ और ही होता ।
खैर हर किसी की अपनी विचारधारा है और उसपे खरा उतरना हर किसी के बस की बात नहीं परंतु एक बार इस बेहतरीन सन्देश वाली समाज शार्ट फ़िल्म को ज़रूर देखें और विचार करें आखिर समाज का चेहरा क्या होना चाहिए क्योंकि सिनेमा समाज का आईना है
बच्चों को ज्यादा समझाने से अच्छा एक बार बच्चो को समझ लिया जाये बहुत अच्छा msg दिया है आपने इस शार्ट वीडियो में-मौंटी कटोच!
समाज
दो दोस्तों कि बीच हुई एक छोटी सी बातचीत को शॉर्ट फिल्म में जिस तरह से काव्या वर्षा ने पिरोया है वह सच्च में काबिलेतारीफ है । एक एक बात समाज के कुछ रूढिवादी तथ्यों पर विचार करने को प्रेरित करती है और कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान देने को कहती है ।
काव्य वर्षा को सफल लेखन और एकलव्य जी को सफल निर्देशन के लिए बधाई- विशाल ठाकुर!
समाज फिल्म हमारे आज के समाज की सोच को दर्शाती है | चंद मिनटों में ये कहानी बहुत बड़ी सीख दे जाती है | कलाकारों के अभिनय के साथ साथ इसके डायलॉग्स बेमिसाल हैं | बहुत खूबसूरती से फिल्माई गई ये मूवी सीधा दिल में उतर जाती है- करिश्मा अरोड़ा!
Good writeup. It seems it has her own background. Credit goes to direction and then to the story. Dialogues are Superb as these might have been changed to suit the film. Very nice- Dr. V K Sharma!

Sach ki Dastak

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Anil Kumar
10 months ago

समाज की कटु सत्यता को हृदय से रेखांकित किया गया है, कार्य तो सच में अद्भुत है ! 👍👍👍👍👍👍

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